भोपाल। मध्य प्रदेश में राज्य सड़क विकास निगम (MPRDC) के अधीन संचालित टोल मार्गों को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के कई प्रमुख मार्गों पर उनकी निर्माण लागत से कहीं अधिक टोल वसूला जा चुका है, इसके बावजूद इन सड़कों पर दुर्घटनाओं और मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
विभागीय मंत्री राकेश सिंह के अनुसार, प्रदेश में निगम के कुल 85 टोल मार्ग हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब किसी एजेंसी का अनुबंध समाप्त होता है, तो नई एजेंसी की नियुक्ति या सड़क उन्नयन कार्य शुरू होने तक वैकल्पिक व्यवस्था के तहत टोल संग्रहण जारी रखा जाता है ताकि निरंतरता बनी रहे।
लागत बनाम वसूली: लेबड़-जावरा और जावरा-नयागांव सबसे आगे
आंकड़ों का विश्लेषण करें तो लेबड़-जावरा मार्ग मुनाफे के मामले में शीर्ष पर है। 124 किमी लंबे इस मार्ग की लागत जहाँ ₹589 करोड़ थी, वहीं अब तक यहाँ से ₹2,378 करोड़ का टोल वसूला जा चुका है। इसी तरह जावरा-नयागांव फोरलेन पर ₹425 करोड़ की लागत के मुकाबले ₹2,634 करोड़ की वसूली की गई है।
सड़कों पर बिछती लाशें: एक गंभीर चिंता
हैरानी की बात यह है कि भारी-भरकम टोल वसूली के बावजूद इन मार्गों पर सुरक्षा मानकों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
| मार्ग का नाम | लंबाई (किमी) | निर्माण लागत | कुल टोल वसूली | दुर्घटनाएं | मौतें |
| लेबड़-जावरा | 124 | ₹589 करोड़ | ₹2,378 करोड़ | 4,123 | 2,225 |
| जावरा-नयागांव | 127 | ₹425 करोड़ | ₹2,634 करोड़ | 3,696 | 1,281 |
| भोपाल-देवास | 140 | ₹621 करोड़ | ₹2,054 करोड़ | 2,872 | 315 |
| ग्वालियर-भिंड | 108 | ₹300 करोड़ | ₹564 करोड़ | 4,727 | 1,503 |
| इंदौर-उज्जैन | 48 | ₹232 करोड़ | ₹389 करोड़ | 3,244 | 556 |
प्रमुख बिंदु:
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ग्वालियर-भिंड मार्ग पर सर्वाधिक दुर्घटनाएं: 108 किमी के इस छोटे से टुकड़े पर 4,727 दुर्घटनाएं दर्ज की गई हैं, जो सुरक्षा इंतजामों की पोल खोलती हैं।
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भोपाल-बैरसिया-सिरोंज: यह इकलौता ऐसा प्रमुख मार्ग है जहाँ फिलहाल वसूली (₹36 करोड़) लागत (₹224 करोड़) से कम है, लेकिन यहाँ मौतों का आंकड़ा (535) चिंताजनक है।
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वैकल्पिक व्यवस्था का तर्क: सरकार का कहना है कि टोल की निरंतरता बनाए रखने के लिए अनुबंध खत्म होने के बाद भी संग्रहण किया जाता है।
विशेष टिप्पणी: प्रदेश की इन सड़कों पर वसूली गई कुल राशि निर्माण लागत से लगभग 3 से 6 गुना तक अधिक हो चुकी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जनता की जेब पर पड़ने वाला यह बोझ अब कम होना चाहिए?




