MP High Court: न्याय की गुहार या मजबूरी का खौफनाक मंजर? अजन्मे बच्चे का भ्रूण लेकर अदालत की दहलीज पर पहुँचा पिता
जबलपुर (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में सोमवार को उस वक्त हड़कंप मच गया, जब एक याचिकाकर्ता सुरक्षा घेरे को तोड़ते हुए न्याय की आस में अपने ही अजन्मे बच्चे का भ्रूण (Foetus) लेकर सीधे जज की ‘डाइस’ तक पहुँच गया। रीवा निवासी दयाशंकर पांडे के इस कदम ने न केवल न्यायिक गलियारों को झकझोर दिया है, बल्कि कोर्ट की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रमुख बिंदु (Highlights):
-
अनोखा विरोध: सबूतों के अभाव में केस कमजोर न पड़ जाए, इसलिए पिता ने पॉलीथीन में रखा भ्रूण कोर्ट में पेश किया।
-
200 करोड़ का फर्जीवाड़ा: आरोपी का दावा है कि एक बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी के घोटाले को उजागर करने की सजा उसके परिवार को मिल रही है।
-
सुरक्षा में भारी चूक: घटना के बाद चार पुलिसकर्मी सस्पेंड, विभाग में मची खलबली।
पूरी घटना: आखिर क्यों उठाना पड़ा ऐसा कदम?
रीवा के रहने वाले दयाशंकर पांडे पूर्व में जबलपुर की प्रसिद्ध ‘शुभ मोटर्स’ में अकाउंटेंट के पद पर तैनात थे। दयाशंकर का आरोप है कि कंपनी ने 200 करोड़ रुपये का वित्तीय फर्जीवाड़ा किया है। उनके मुताबिक, इस घोटाले की शिकायत करने के बाद से ही उन पर और उनके परिवार पर जानलेवा हमले शुरू हो गए।
हादसे में खोया बच्चा: याचिकाकर्ता का दावा है कि 1 मार्च 2026 को एक संदिग्ध सड़क दुर्घटना में उनकी पत्नी गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। इस हादसे के कारण डॉक्टरों को गर्भपात (Abortion) करना पड़ा। दयाशंकर का कहना है:
“न्यायालय में हर बात का सबूत मांगा जाता है। सिस्टम की अनदेखी और लगातार हो रहे हमलों के बीच, मैं अपने अजन्मे बच्चे का भ्रूण ही सबसे बड़े सबूत के तौर पर लेकर यहाँ आया हूँ।”
कोर्ट में अफरा-तफरी और पुलिस की कार्रवाई
न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ के समक्ष जैसे ही यह मामला आया, पूरी कोर्ट में सन्नाटा पसर गया। सिविल लाइन पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए दयाशंकर को हिरासत में ले लिया है। जब्त किए गए भ्रूण को वास्तविकता और उम्र की पुष्टि के लिए फॉरेंसिक लैब (FSL) भेज दिया गया है।
सुरक्षा पर गिरी गाज: 4 जवान निलंबित
हाई कोर्ट जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इस तरह की वस्तु का पहुँचना सुरक्षा की बड़ी विफलता मानी जा रही है। एसपी संपत उपाध्याय ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए ड्यूटी पर तैनात एएसआई मुन्ना अहिरवार समेत चार जवानों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। इन सभी के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश भी दिए गए हैं।
कानूनी और नैतिक सवाल
यह घटना प्रदेश की कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले व्हिसलब्लोअर्स (Whistleblowers) की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े करती है। क्या एक आम आदमी को न्याय के लिए इस हद तक मजबूर होना पड़ना चाहिए? फिलहाल, पुलिस मामले के हर पहलू की बारीकी से जांच कर रही है।




