भोपाल: मध्य प्रदेश में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के दावों की पोल खुल चुकी है। प्रदेश को ‘स्वर्णिम’ बनाने का सपना दिखाने वाली सरकार अपने उन इंजीनियरों को वेतन तक नहीं दे पा रही है, जो ज़मीनी स्तर पर विकास की इबारत लिखते हैं। जुलाई 2025 से मार्च 2026 के बीच इन संविदा उप-यंत्रियों को केवल एक माह का वेतन नसीब हुआ है।
परिणामस्वरूप, आक्रोशित इंजीनियरों ने 19 मार्च से शुरू होने वाले ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ से किनारा करने का एलान कर दिया है।
मुख्य बिंदु: सिस्टम की नाकामी का कच्चा चिट्ठा
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भुखमरी की कगार पर परिवार: 8 महीनों में महज एक महीने की पगार। आर्थिक तंगी अब मानसिक प्रताड़ना बन चुकी है।
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मौत का सिलसिला: अगस्त 2025 से अब तक 10 इंजीनियरों की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो चुकी है। क्या सरकार इन मौतों की ज़िम्मेदारी लेगी?
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अधिकारी की लापरवाही: मनरेगा परिषद के आयुक्त अवि प्रसाद पर समय रहते वित्तीय मांग न भेजने और बजट को अन्य मदों में खर्च करने के गंभीर आरोप।
इंजीनियरों की ‘अर्थी’ पर खड़ा है सरकारी अभियान?
मनरेगा अभियंता संघ के प्रदेश समन्वयक गजेंद्र कठारे ने जो आंकड़े पेश किए हैं, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। हाल ही में राजगढ़ के 42 वर्षीय सूरज मालवीय और भिंड के 48 वर्षीय सत्येंद्र शर्मा की मृत्यु ने सिस्टम के क्रूर चेहरे को बेनकाब कर दिया है।
“माननीय मुख्यमंत्री जी, क्या ‘समान कार्य-समान वेतन’ का वादा सिर्फ चुनावी रैलियों के लिए था? पिछले 20 वर्षों से सेवा दे रहे इन इंजीनियरों के भविष्य को अनिश्चितता की गर्त में धकेलकर आप कौन सा रामराज्य स्थापित कर रहे हैं?”
मांगें जो अनसुनी कर दी गईं:
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लंबित वेतन का तत्काल भुगतान।
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संविदा प्रथा को समाप्त कर सेवा में स्थिरता।
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‘समान कार्य-समान वेतन’ नीति को धरातल पर उतारना।
निष्कर्ष: खोखले विज्ञापनों से पेट नहीं भरता!
एक तरफ सरकार करोड़ों रुपये विज्ञापनों पर खर्च कर ‘जल संवर्धन’ के ढोल पीट रही है, वहीं दूसरी ओर इस अभियान को सफल बनाने वाले हाथ खाली हैं। जब घर का चूल्हा ही नहीं जलेगा, तो इंजीनियर जल संरक्षण की फाइलें कैसे भरेंगे?




