एग्रसर इंडिया (AgrasarIndia) भोपाल डेस्क टीम
मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत: एक तरफ शिक्षकों का भारी टोटा और जर्जर स्कूल, तो दूसरी तरफ चुनिंदा जिलों में जमावड़ा
भोपाल: मध्य प्रदेश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में प्रशासनिक लापरवाही और असंतुलित पदस्थापना का एक बेहद चिंताजनक चेहरा सामने आया है। राज्य के एक तरफ जहां कई सरकारी स्कूल मात्र एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं या जर्जर भवनों के कारण मंदिरों व पेड़ों के नीचे कक्षाएं लग रही हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ चुनिंदा स्कूलों और जिलों में शिक्षकों का अत्यधिक जमावड़ा बना हुआ है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच शिक्षक-छात्र अनुपात का यह भारी अंतर शिक्षा की गुणवत्ता पर बड़ा सवालिया निशान लगा रहा है।
मुख्य बिंदु (Highlights)
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एक शिक्षक और प्रशासनिक बोझ: कई सरकारी स्कूलों में एक ही शिक्षक को अध्यापन के साथ-साथ मध्याह्न भोजन प्रबंधन, यू-डाइस प्रविष्टि, समग्र आईडी पोर्टल अपडेट और बच्चों को स्कूल लाने जैसे तमाम गैर-शैक्षणिक कार्य देखने पड़ रहे हैं, जिससे शिक्षण कार्य प्रभावित हो रहा है।
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राजधानी भोपाल के दो उदाहरण:
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इनायतपुर प्राथमिक स्कूल: यहाँ 51 विद्यार्थियों पर केवल 1 महिला शिक्षक हैं। शिक्षक के सेवानिवृत्त होने के बाद नई पदस्थापना न होने के कारण पहली से पांचवीं तक के सभी बच्चे सीलन भरे एक ही कमरे में पढ़ने को मजबूर हैं।
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नूतन सुभाष स्कूल: जर्जर भवन के कारण शिफ्ट होने के बाद यहाँ छात्रों की संख्या 1200 से घटकर 212 रह गई है, लेकिन इसके विपरीत यहाँ 25 शिक्षक तैनात हैं। फिर भी जगह के अभाव में 5वीं से 8वीं तक के छात्र एक ही कमरे में बैठने को विवश हैं।
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प्रदेश के अन्य जिलों की बदहाली:
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मुरैना (चक्कपुरा): जर्जर भवन के कारण 50 बच्चों को 1 शिक्षक पेड़ के नीचे पढ़ाने को मजबूर है, और बारिश होने पर स्कूल की छुट्टी करनी पड़ती है।
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राजगढ़ (बड़ल्या): प्राथमिक स्कूल का भवन पिछले 5 सालों से जर्जर है, जिसके चलते 9 बच्चे मजबूरी में खेड़ापति हनुमान मंदिर के दलान (प्रांगण) में पढ़ाई कर रहे हैं।
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इंदौर (महू-मानपुर): ‘कवच संस्था’ द्वारा झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों के लिए बांस-बल्लियों और ग्रीन नेट से अस्थायी पाठशाला शुरू की गई है।
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शहरी-ग्रामीण अनुपात में अंतर और शिक्षकों का असंतुलन
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अनुपात की असमानता: भोपाल, इंदौर और ग्वालियर जैसे बड़े महानगरों में 19 से 20 छात्रों पर 1 शिक्षक उपलब्ध है। इसके विपरीत, आदिवासी और पिछड़े जिलों—जैसे सिंगरौली में 42, झाबुआ में 38 और छतरपुर-टीकमगढ़ में 35 छात्रों पर 1 शिक्षक—की स्थिति बेहद चिंताजनक है, जबकि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत यहाँ 25 छात्रों पर 1 शिक्षक होना अनिवार्य है।
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चुनिंदा जिलों में शिक्षकों का जमावड़ा: राज्य के कुल 3.08 लाख शिक्षकों में से 10.55% (यानी 32,612 शिक्षक) केवल 5 जिलों (ग्वालियर, उज्जैन, सतना, मंडला और रायसेन) में ही पदस्थ हैं।
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एक शिक्षक के भरोसे स्कूल: मध्य प्रदेश के 2,269 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जो केवल 1 शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जिनमें कुल 62,151 बच्चों का भविष्य दांव पर है। इसके अलावा, माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने वाले 20.3% शिक्षकों के पास कोई औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण भी नहीं है।




