भोपाल की सड़कों पर घूमते कुत्तों के झुंड मासूमों और बुजुर्गों को अपना निशाना बना रहे थे। उनकी वजह से 35 से ज्यादा लोग रेबीज का टीका लगवाने के लिए पहुंच …और पढ़ें

भोपाल की सड़कों पर आवारा कुत्तों का डेरा (फाइल फोटो)
HighLights
- रंगपंचमी के उल्लास पर भारी पड़ी कुत्तों की दहशत
- एक दिन में 35 से ज्यादा मासूम और बुजुर्ग शिकार
- जेपी अस्पताल में रेबीज के टीके के लिए लगी कतार
भोपाल। रविवार जहां एक ओर शहर रंगपंचमी के उल्लास में सराबोर था, वहीं दूसरी ओर सड़कों पर घूमते कुत्तों के झुंड मासूमों और बुजुर्गों को अपना निशाना बना रहे थे। आलम यह रहा कि त्यौहार की खुशी शाम होते-होते दहशत में बदल गई। रंगपंचमी के मौके पर रविवार को अकेले जेपी अस्पताल में दोपहर तक 35 से अधिक मरीज रेबीज का टीका लगवाने पहुंचे।
राजधानी के अलग-अलग कोनों से आए कुत्तों के काटने के मामलों ने प्रशासन के दावों की पोल खोल दी है। अकेले जेपी अस्पताल में दोपहर तक 35 से अधिक लोग एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगवाने पहुंचे। सड़कों पर पैदल चलना अब किसी खतरे से खाली नहीं रह गया है, क्योंकि झुंड में घूमते कुत्ते राहगीरों पर अचानक हमला कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि नगर निगम की डाग स्क्वाड और नसबंदी टीमें केवल कागजों पर सक्रिय हैं। जमीनी स्तर पर संसाधनों की भारी कमी दिख रही है।
आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और उनकी आक्रामकता ने नगर निगम के नसबंदी अभियान की विफलता को उजागर कर दिया है। संसाधनों की कमी से नसबंदी की गति धीमी स्वास्थ्य विशेषज्ञों और नगर निगम के पशु चिकित्सा अधिकारी डा. पीपी सिंह का मानना है कि संसाधनों की कमी के चलते नसबंदी की गति धीमी है।
उन्होंने कहा कि इसी की वजह से शहर में कुत्तों की बढ़ती संख्या बढ़ती जा रही है। गर्मियों के मौसम और त्योहारों के दौरान शोर-शराबे में आवारा कुत्ते अधिक आक्रामक हो जाते हैं। यदि समय पर नसबंदी और टीकाकरण नहीं होता, तो इनका व्यवहार हिंसक बना रहता है।




