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भोपाल: कमर्शियल गैस की किल्लत से ‘स्वाद’ पर संकट; तंदूर हुए ठंडे, अब इंडक्शन और बिजली बिल ने बढ़ाई टेंशन

भोपाल: मध्य प्रदेश की राजधानी में कमर्शियल गैस सिलेंडरों की भारी किल्लत ने कैफे, रेस्टोरेंट और स्ट्रीट फूड वेंडर्स की कमर तोड़ दी है। गैस न मिलने और ऊँची कीमतों के कारण शहर के मशहूर फूड जॉइंट्स अब विकल्प तलाश रहे हैं, लेकिन यह बदलाव उनके मुनाफे और खाने की गुणवत्ता, दोनों को प्रभावित कर रहा है।

प्रमुख बिंदु (HighLights):

  • बुझ गई तंदूर की आंच: गैस की कमी के कारण रेस्टोरेंट्स ने तंदूर वाले व्यंजन (रोटी, टिक्का आदि) मेन्यू से हटाए।

  • महंगी हुई बिजली: इंडक्शन के बढ़ते उपयोग से कमर्शियल बिजली बिलों में 15-20% का भारी उछाल।

  • स्वाद से समझौता: ग्राहकों की शिकायत— “इंडक्शन पर बना खाना पहले जैसा स्वादिष्ट और ठीक से पका हुआ नहीं है।”

  • मजबूरी का सौदा: छोटे दुकानदार अब चोरी-छिपे घरेलू सिलेंडरों का उपयोग करने को मजबूर।


कैफे और रेस्टोरेंट: इंडक्शन बना ‘सिरदर्द’

दस नंबर मार्केट और गौतम नगर जैसे प्राइम लोकेशन के कैफे संचालकों का कहना है कि गैस संकट ने उन्हें तकनीक बदलने पर मजबूर तो किया, लेकिन यह घाटे का सौदा साबित हो रहा है।

  • लागत में वृद्धि: रेस्टोरेंट मैनेजर राहुल मेहरा के अनुसार, एसी और फ्रिज के साथ इंडक्शन चलने से बिजली बिल आसमान छू रहा है।

  • सीमित मेन्यू: कैफे संचालक ऐश्वर्य बताते हैं कि हर व्यंजन इंडक्शन पर नहीं बन सकता। विशेष रूप से ‘डीप फ्राई’ (ज्यादा तले हुए) आइटम की क्वालिटी गिर गई है, जिसके कारण कई डिशेज बंद करनी पड़ी हैं।


चाय और फास्ट फूड: ‘देसी’ सेटअप पर आधुनिक मार

चाय और फास्ट फूड बेचने वाले छोटे कारोबारियों के लिए स्थिति और भी गंभीर है:

  1. चाय का स्वाद गायब: नेहरू नगर के स्वप्निल सोनी बताते हैं कि चाय को बार-बार उबालना पड़ता है, जो गैस पर आसान है। इंडक्शन पर चाय बनाना न केवल कठिन है, बल्कि वह सोंधापन भी नहीं आता।

  2. स्ट्रीट फूड वेंडर्स: एमपी नगर में दुकान लगाने वाले अजय यादव जैसे छोटे दुकानदार कहते हैं कि उनके पास बिजली का कनेक्शन नहीं है कि वे इंडक्शन चला सकें। ऐसे में वे या तो महंगा कमर्शियल सिलेंडर खरीद रहे हैं या घरेलू सिलेंडर का जोखिम भरा उपयोग कर रहे हैं।


आगे क्या? कीमतें बढ़ने के आसार

कारोबारियों का कहना है कि यदि अगले कुछ दिनों में गैस की आपूर्ति सामान्य नहीं हुई, तो उनके पास खाने की कीमतें (Prices) बढ़ाने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। फिलहाल मेन्यू में कटौती कर काम चलाया जा रहा है, लेकिन ग्राहकों की बढ़ती शिकायतों ने उनकी चिंता बढ़ा दी है।


निष्कर्ष: प्रशासन के दावों और हकीकत में अंतर

जहाँ एक ओर प्रशासनिक अधिकारी सब कुछ सामान्य होने का दावा कर रहे हैं, वहीं भोपाल की सड़कों पर कड़ाही और तंदूर ठंडे पड़ना हकीकत बयां कर रहे हैं। क्या बिजली का करंट, गैस की कमी को पूरा कर पाएगा? यह सवाल फिलहाल भोपाल के हर फूड हब में गूँज रहा है।

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