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भोपाल: रसूखदारों को भारी पड़ा ‘श्वान’ प्रेम; मेनका गांधी और PMO के हस्तक्षेप के बाद बिस्कुट-मछली लेकर भागी ‘भेल’ की टीम

भोपाल: राजधानी के अवधपुरी क्षेत्र की एक पॉश कवर्ड कॉलोनी इन दिनों एक अजीबोगरीब घटनाक्रम को लेकर सुर्खियों में है। कॉलोनी से आवारा श्वानों को हटाने के प्रशासनिक फैसले ने तब तूल पकड़ लिया, जब इसमें मेनका गांधी और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक की एंट्री हो गई। नतीजा यह हुआ कि भेल के जिम्मेदार अधिकारियों को दफ्तर छोड़कर 8 दिनों तक एक कुतिया की तलाश में गली-गली भटकना पड़ा।

मुख्य बिंदु (Highlights):

  • हाई-प्रोफाइल शिकायत: मामला मेनका गांधी और PMO तक पहुँचा, जिससे रसूखदार पदाधिकारियों की नींद उड़ गई।

  • त्योहारों पर ‘ऑपरेशन डॉग’: होली और रंगपंचमी के जश्न के बीच पदाधिकारी खेतों में श्वान को खोजते रहे।

  • नॉन-वेज डिप्लोमेसी: 8 दिनों बाद मछली, मांस और बिस्कुट के लालच से काबू में आई ‘लापता’ कुतिया।


कैसे शुरू हुआ विवाद?

अवधपुरी की इस सोसाइटी में रहने वाली एक महिला डॉक्टर रोज एक आवारा कुतिया को खाना खिलाती थीं। सोसाइटी के पदाधिकारियों (जो भेल के कर्मचारी भी हैं) ने सुरक्षा के मद्देनजर कॉलोनी से आवारा श्वानों को बाहर भगा दिया। अपने पसंदीदा श्वान के गायब होने से क्षुब्ध महिला डॉक्टर ने इसकी शिकायत नगर निगम, पुलिस कमिश्नर, पेटा (PETA) और सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय तक कर दी।

मेनका गांधी का पत्र और बढ़ता दबाव: पूर्व केंद्रीय मंत्री और पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी ने इस मामले में सक्रियता दिखाते हुए पत्र लिख दिया। शिकायत भेल प्रबंधन तक भी जा पहुँची, जिसके बाद अधिकारियों के पास श्वान को वापस ढूंढकर लाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।


खेतों में ‘नान-वेज’ के साथ दौड़ते रहे अफसर

मामला इतना गंभीर हो गया कि सोसाइटी के अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष को अपने दफ्तरों से छुट्टियाँ लेनी पड़ीं। जहाँ पूरा शहर होली और रंगपंचमी मना रहा था, वहीं ये अधिकारी दूर-दराज के इलाकों और खेतों में श्वान की तलाश कर रहे थे।

  • सातवें दिन मिली सफलता: सात दिन की कड़ी मशक्कत के बाद श्वान सुदूर खेतों में दिखाई दी, लेकिन वह पकड़ में नहीं आ रही थी।

  • लालच का सहारा: अधिकारियों ने उसे काबू में करने के लिए ‘नॉन-वेज डिप्लोमेसी’ अपनाई। वे दो दिनों तक हाथ में बिस्कुट, ब्रेड और मछली-मुर्गे का मांस लेकर उसके पीछे भागते रहे, ताकि उसे बहलाकर पकड़ा जा सके।


कानून के शिकंजे से मिली राहत

आठवें दिन कड़ी मशक्कत के बाद श्वान को सुरक्षित पकड़कर वापस कॉलोनी लाया गया। श्वान की वापसी के बाद ही महिला डॉक्टर का गुस्सा शांत हुआ और प्रशासन ने अपनी कार्रवाई रोकी।

निष्कर्ष: कॉलोनी के रहवासी अब दबी जुबान में चर्चा कर रहे हैं कि किसी जीव को हटाना तो आसान है, लेकिन जब कानून और ‘रसूख’ आमने-सामने हों, तो एक आवारा श्वान भी बड़े-बड़ों के पसीने छुड़ा सकता है।

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