जमीन घोटाला
भोपाल न्यूज
प्रशासनिक धांधली
ADM जांच
भोपाल। राजधानी के हुजूर तहसील में भ्रष्टाचार का एक ऐसा ‘चमत्कारी’ मामला सामने आया है, जिसे देखकर बड़े-बड़े जादूगर भी शरमा जाएं। यहां फाइलें तब चलती हैं जब इंसान की सांसें रुक जाती हैं। एक रसूखदार पंचायत सचिव ने अपनी मृत पत्नी को ‘सरकारी कागजों’ पर पुनर्जीवित कर न केवल जमीन का आदेश निकलवा लिया, बल्कि इस ‘कारनामे’ में पटवारी से लेकर साहब (अपर तहसीलदार) तक ने कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया।
मामले की मुख्य बातें:
• यमराज को मात: मौत के 73 दिन बाद साइन हुए कागजात!
• गणित का जादू: 0.072 हेक्टेयर जमीन वाला 0.413 हेक्टेयर का अतिक्रमणी बना दिया गया!
• बड़ी मिलीभगत: पंचायत सचिव, पटवारी और अपर तहसीलदार – तीनों एक साथ!
• डिजिटल सिस्टम फेल: मृत व्यक्ति का आवेदन डिजिटल पोर्टल पर कैसे स्वीकार हुआ?
• ADM जांच का आदेश: कलेक्टर ने मामले की जांच ADM (उत्तर) को सौंपी।
यमराज को मात: मौत के 73 दिन बाद साइन हुए कागजात!
कहते हैं कानून के हाथ लंबे होते हैं, लेकिन भोपाल में तो कानून के हाथ ‘यमलोक’ तक पहुंच गए हैं। ग्राम पंचायत खेजड़ा देव के सचिव करन सिंह की पत्नी बेबीबाई का इंतकाल 10 नवंबर 2024 को हो गया था। लेकिन सरकारी रिकॉर्ड का जादू देखिए—22 जनवरी 2025 को तहसीलदार कार्यालय से मृत पत्नी के नाम पर जमीन का आदेश जारी हो जाता है। डिजिटल इंडिया के दौर में यह किसी ‘चमत्कार’ से कम नहीं कि एक मृत व्यक्ति स्वर्ग से आकर तहसील में आवेदन दे रहा है और सिस्टम उसे स्वीकार भी कर रहा है।
घटनाक्रम की टाइमलाइन:
गणित ऐसा कि आर्यभट्ट भी सिर पकड़ लें!
भ्रष्टाचार के इस खेल में ‘लॉजिक’ की बलि दे दी गई। शिकायतकर्ता सर्राफा कारोबारी संजय अग्रवाल के पास कुल 0.072 हेक्टेयर जमीन है। लेकिन पटवारी तरुण श्रीवास्तव और अपर तहसीलदार आलोक पारे की ‘जुगलबंदी’ ने ऐसी रिपोर्ट तैयार की, जिसमें संजय को 0.413 हेक्टेयर जमीन का अतिक्रमणकारी बता दिया गया। अब सवाल यह है कि जिसके पास एक कटोरी जितनी जमीन हो, वह पूरे तालाब पर कब्जा कैसे कर सकता है? यह जादुई गणित सिर्फ हुजूर तहसील के पटवारी ही समझा सकते हैं।
आरोपों के घेरे में अधिकारी:
ADM जांच की ‘लोरी’ या कार्रवाई का ‘हंटर’?
मामला सुर्खियों में आने के बाद कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह ने ADM (उत्तर) को जांच सौंप दी है। लेकिन जनता पूछ रही है—क्या यह जांच भी फाइल दबाने का एक और तरीका है?
महत्वपूर्ण सवाल:
- क्या मृत व्यक्ति के नाम पर कूटरचना करने के लिए BNS (IPC) की धाराओं के तहत FIR दर्ज होगी?
- क्या उन ‘कुर्सीधारियों’ पर गाज गिरेगी जिन्होंने आंखों पर नोटों की पट्टी बांधकर मृत महिला के आवेदन पर साइन किए?
- डिजिटल इंडिया या ‘दलाल इंडिया’?
हमारा नजरिया:
“यह मामला केवल भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि डिजिटल सिस्टम के मुंह पर तमाचा है। जब पटवारी और तहसीलदार खुद ही भू-माफिया की भूमिका में आ जाएं, तो आम आदमी इंसाफ की उम्मीद किससे करे?”
यह भोपाल प्रशासन के लिए ‘एसिड टेस्ट’ है। अगर इस मामले में केवल छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया गया और बड़े अधिकारी (अपर तहसीलदार) बच निकले, तो समझ लीजिए कि ‘साहब’ का संरक्षण ही भ्रष्टाचार की असली खाद है। अब देखना यह है कि बाबा का बुलडोजर इन कागजी जालसाजों के घरों तक पहुंचता है या नहीं।




