भोपाल। शिशु और मातृ मृत्यु दर कम करने के लिए सबसे जरूरी यह है कि गंभीर स्थिति में गर्भवती महिला की तुरंत सीजर डिलिवरी हो सके। इसके बाद भी हालत यह है कि प्रदेश के केवल 98 शासकीय अस्पतालों में ही सीजर डिलिवरी की सुविधा 24 घंटे उपलब्ध है। गंभीर स्थिति में सीजर के लिए महिला को दूसरे अस्पतालों में रेफर किया जाता है। सुविधा नहीं होने की बड़ी वजह विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। एनेस्थीसिया, स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ और शिशु रोग विशेषज्ञ के होने पर ही सीजर किया जा सकता है। ऐसे में मजबूरी में कई बार स्वजन को गर्भवती को निजी अस्पताल लेकर जाना पड़ता है।
विशेषज्ञों की भर्ती के लिए आकर्षक सेवा-शर्तों की तैयारी
स्वास्थ्य विभाग देख रहे उप मुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने हाल ही में अधिकारियों के साथ एक बैठक में कहा है कि विशेषज्ञों की भर्ती में सेवा-शर्तों को आकर्षक बनाया जाएगा। सूत्रों के अनुसार सरकार पीएससी की जगह विभाग के माध्यम से ही विशेषज्ञ डॉक्टरों की भर्ती की तैयारी कर रही है। कैबिनेट से स्वीकृति के बाद यह व्यवस्था लागू होगी। हालांकि, इसके पहले भी स्वास्थ्य विभाग ने विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए कई प्रयास किए, पर खास सफलता नहीं मिली।
‘यू कोट, वी पे’ योजना के बावजूद डॉक्टरों की कमी बरकरार
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के माध्यम से ‘यू कोट, वी पे’ योजना के माध्यम से इन तीनों विधाओं में विशेषज्ञ भर्ती करने का प्रयास किया गया, फिर भी आवश्यकता के अनुसार डॉक्टर नहीं मिल रहे हैं। यही कारण है कि 155 फर्स्ट रेफरल यूनिट में से 98 में ही 24 घंटे सीजर की सुविधा है। बता दें, सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की रिपोर्ट के अनुसार प्रति हजार जीवित जन्म पर 37 शिशुओं की मौत (आइएमआर) एक वर्ष के भीतर हो जाती है। इसी तरह प्रति लाख 142 माताओं की मौत (एमएमआर) हो रही है। राज्य सरकार ने वर्ष 2030 तक आइएमआर 10 और एमएमआर 80 तक लाने का लक्ष्य रखा है।
यहां होनी चाहिए सीजर डिलिवरी की सुविधा
सभी सरकारी मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), सिविल अस्पतालों में सीजर डिलीवरी की सुविधा होनी चाहिए। प्रदेश में अभी 19 मेडिकल कॉलेज, 55 जिला अस्पताल, 158 सिविल अस्पताल और 348 सीएचसी हैं। इन सभी को जोड़ लें तो 580 अस्पताल हो रहे हैं, जहां सीजर डिलीवरी होनी चाहिए, पर विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी के चलते मात्र 155 में ही है। विशेषज्ञों के 5,443 स्वीकृत पदों में से 3,948 पद खाली हैं और मात्र 1,495 ही कार्यरत हैं। छोटे जिलों की स्थिति और खराब है।




