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फैट वॉलेट सिंड्रोम : पिछली जेब में मोटा पर्स रखना पड़ सकता है भारी

 

फैट वॉलेट सिंड्रोम से रीढ़ की हड्डी और कमर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। पिछली जेब में मोटा पर्स रखने से साइटिक नस दबती है, जिसकी वजह से शरीर में दर्द होता है। इसको लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि पर्स हल्का रखें और पिछली जेब में न रखें। जागरूकता और सावधानी से इस समस्या से बचा जा सकता है। स्वास्थ्य के लिए आदत बदलना जरूरी है।

फैट वॉलेट सिंड्रोम : पिछली जेब में मोटा पर्स रखना पड़ सकता है भारी

HighLights

  1. लंबे समय तक पर्स पर बैठने से रीढ़ की हड्डी का संतुलन बिगड़ जाता है।
  2. इससे धीरे-धीरे कमर व रीढ़ की हड्डी में दर्द शुरू हो सकता है।
  3. समय रहते ध्यान न देने पर यह समस्या गंभीर रोग का रूप ले सकती है।

भोपाल। अक्सर लोग मोटा पर्स पिछली जेब में रखकर बैठ जाते हैं, लेकिन यह आदत स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। इसे फैट वालेट सिंड्रोम कहा जाता हैं। लंबे समय तक पर्स पर बैठने से रीढ़ की हड्डी का संतुलन बिगड़ जाता है और शरीर का पोश्चर खराब हो जाता है। इससे कूल्हों की स्थिति असमान्य हो जाती है, मांसपेशियों पर दबाव बढ़ता है और धीरे-धीरे कमर व रीढ़ की हड्डी में दर्द शुरू हो सकता है।

कुछ ऐसी ही समस्या को लेकर मरीज भोपाल शहर के डॉक्टरों और फिजियोथैरेपिस्ट के पास पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह समस्या शुरुआत में मामूली लगती है, लेकिन समय रहते ध्यान न देने पर गंभीर रोग का रूप ले सकती है। लोगों को पर्स जेब में रखने की आदत से बचना चाहिए।

फैट वालेट सिंड्रोम वह स्थिति है जब कोई व्यक्ति बार-बार पिछली जेब में मोटा पर्स रखकर बैठता है। लंबे समय तक ऐसा करने से कूल्हों की पोज़िशन असमान हो जाती है और रीढ़ की हड्डी का संतुलन बिगड़ जाता है। इससे रीढ़ की हड्डी पर दबाव बढ़ता है और साइटिक नस प्रभावित होती है।

मरीज को कमर, कूल्हों और पैरों में दर्द, झुनझुनी या सुन्नपन महसूस होने लगता है। लगातार ऐसा होने पर साइटिका और लोअर बैक पेन जैसी समस्याएं सामने आती हैं। यह समस्या पुरुषों में ज्यादा देखी जाती है, क्योंकि वे पर्स पिछली जेब में रखते हैं।

रीढ़ की हड्डी का संतुलन बिगड़ने के साथ सुन्नपन भी

एमपीटी (आर्थोपेडिक) और पीएचडी स्कालर डॉ. सुनील पांडेय का कहना है कि पिछली जेब में पर्स रखकर बैठने से रीढ़ की हड्डी का अलाइनमेंट बिगड़ जाता है। इससे साइटिका नस पर दबाव पड़ता है, जिसके कारण पैरों में तेज दर्द, झुनझुनी या सुन्नपन हो सकता है। लगातार दबाव पड़ने से पीठ के निचले हिस्से में दर्द शुरू हो जाता है और मांसपेशियां असंतुलित होकर खिंच जाती हैं।

जागरुकता जरूरी

विशेषज्ञों ने कहा- बचाव ही इसका सबसे अच्छा इलाज विशेषज्ञों का कहना है कि अगर लोग सावधानी बरतें तो इस समस्या से आसानी से बचा जा सकता है। मोटा पर्स पिछली जेब में रखने की बजाय सामने की जेब, शर्ट या जैकेट में रखें। पर्स में अनावश्यक सामान न भरें और उसे हल्का रखें। साथ ही पर्स की जगह बदलते रहें ताकि एक ही तरफ दबाव न पड़े।

हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. यूडी सक्सेना बताते हैं कि गलत पोश्चर सिर्फ कमर ही नहीं, बल्कि गर्दन की समस्या भी बढ़ाता है। लैपटाप व कंप्यूटर पर झुककर काम करने या गर्दन आड़ी-तिरछी रखकर बैठने से सर्वाइकल स्पान्डिलाइटिस जैसी दिक्कतें सामने आती हैं। सही बैठने की आदत और संतुलित पोश्चर बनाए रखना ही स्वस्थ रीढ़ और कमर के लिए जरूरी है।

साइटिका और कमर दर्द का खतरा

जेब में पर्स रखकर बैठने पर लंबे समय में कूल्हों और पेल्विस की संरचना भी प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि ऐसे मरीजों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। शुरुआत की इसका प्रभाव व्यक्ति को दिखाई नहीं देता, लेकिन लंबे समय में यह बीमारी का कारण बन जाता है।

 

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