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भोपाल में सरकारी अस्पतालों का ‘इमरजेंसी’ हाल, ‘जब मरने की स्थिति हो, तभी आना’, रविवार को डॉक्टरों के बजाय किस्मत भरोसे मरीज

 

भोपाल। देश के स्वच्छतम शहर इंदौर में दूषित पानी से फैली बीमारी के बाद एमवाय जैसे बड़े सरकारी अस्पताल में भर्ती मरीजों को बेहतर इलाज के लिए निजी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इसने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नवदुनिया ने भोपाल के दो सबसे बड़े अस्पताल हमीदिया अस्पताल और जेपी जिला अस्पताल का रियलिटी चेक किया, तो सामने आया कि सरकार की यह लाइफलाइन जरूरत पड़ने पर नाकाफी साबित हो रही है।

किसी दुर्घटना में घायल होकर पहुंचे मरीज को आपातकालीन सुविधा देने से यहां डॉक्टर इसलिए मना कर देते हैं कि उसकी स्थिति मरने लायक नहीं है। अगर कोई सामान्य व्यक्ति रविवार को बीमार पड़ जाए, तो उसका इलाज भगवान भरोसे ही रह जाता है।

 

हमीदिया अस्पताल- ‘जब जान पर बन आए, तभी आना…’

प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल हमीदिया के इमरजेंसी वार्ड में संवेदनहीनता की तमाम हदें पार हो चुकी हैं। सड़क दुर्घटना में गंभीर घायल होकर सागर से आए एक व्यक्ति को सात दिनों तक अस्पताल में बिस्तर नसीब नहीं हुआ। डॉक्टरों का जवाब था कि “जब स्थिति मरने जैसी हो, तभी आना।”

नतीजतन, टूटा पैर लेकर घायल अस्पताल के रैनबसेरे में तड़पने को मजबूर है। रविवार को ओपीडी और सरकारी दवा काउंटर बंद रहने से हालात और भयावह हो जाते हैं। एकमात्र अमृत फार्मेसी में भी अक्सर दवाओं का टोटा रहता है, जिससे मरीजों को निजी मेडिकल स्टोर से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। डॉक्टरों के साथ-साथ नर्सिंग स्टाफ का व्यवहार भी मरीजों के लिए पीड़ादायक बना हुआ है।

कंधों पर स्ट्रेचर, सिस्टम नदारद

अस्पताल में वार्ड बॉय मिलना किसी चुनौती से कम नहीं है। मरीजों के परिजन खुद ही स्ट्रेचर धकेलने को मजबूर हैं। गंभीर मरीजों को ऊपरी मंजिलों तक ले जाने के लिए स्वजन स्वयं पसीना बहा रहे हैं। लिफ्ट तक पहुंचाने और स्ट्रेचर खींचने का काम भी परिजनों को ही करना पड़ रहा है।

लोगों का दर्द

जनाब अली, सागर (मरीज के पिता) का कहना है कि “बेटे का एक्सीडेंट हुआ, नस चोक थी, लेकिन आयुष्मान कार्ड न होने पर डॉक्टरों ने भर्ती नहीं किया। कहा गया कि मरने की स्थिति में आओगे तभी भर्ती करेंगे। सात दिन रैनबसेरे में भटकना पड़ा। आयुष्मान कार्ड बनने के बाद ही भर्ती किया गया।”

ऑर्डर देने पर भी नहीं मिल रही दवा

मनोज गठले, साकेत नगर का कहना है कि “मेरी 14 साल की बेटी को झटके आते हैं। उसकी हैवी डोज की दवा बाहर नहीं मिलती, इसलिए हमीदिया की अमृत फार्मेसी आता हूं। पहले से ऑर्डर देने के बावजूद आज कम दवा मिली। यह स्थिति हमेशा बनी रहती है।”

इनका कहना है

डॉ. कविता एन. सिंह, डीन, गांधी मेडिकल कॉलेज, भोपाल का कहना है कि “हमीदिया अस्पताल में मरीजों को बेहतर इलाज देना हमारी प्राथमिकता है। आयुष्मान कार्ड की प्रक्रिया तकनीकी हो सकती है, लेकिन किसी गंभीर मरीज को इलाज से मना करना गलत है। रैनबसेरे में मरीज के रुकने और बेड न मिलने के मामले की जांच कराई जाएगी। रविवार को स्टाफ की कमी दूर करने के निर्देश दिए जाएंगे। अमृत फार्मेसी में दवाओं की उपलब्धता की समीक्षा की जाएगी। यहां रेडक्रास की फार्मेसी भी शुरू होने वाली है।”

जेपी अस्पताल- वाटर कूलर के पास पशुओं का मल

जिला अस्पताल जेपी की हकीकत इंदौर जैसी आपात स्थितियों से निपटने के दावों की पोल खोलती है। यहां मरीजों को इलाज के साथ गंदगी की मार भी झेलनी पड़ रही है। वाटर कूलर के पास पशुओं का मल पड़ा होना सफाई व्यवस्था की पोल खोलता है।

वरिष्ठ डॉक्टरों की कमी के चलते मरीजों का इलाज पीजी छात्रों के भरोसे है। हाल ही में फफूंद लगी दवाएं और कीड़े वाले माउथवॉश दिए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। इमरजेंसी वार्ड में ऑक्सीजन और वेंटिलेटर मौजूद हैं, लेकिन उन्हें संचालित करने वाला स्टाफ अक्सर नदारद रहता है। रात के समय डॉक्टरों की देरी और अभद्र व्यवहार मरीजों की परेशानी बढ़ा देता है।

जले सॉकेट और बंद पड़े सुरक्षा इंतजाम

जेपी अस्पताल के श्वसन रोग विभाग में शॉर्ट सर्किट का खतरा बना हुआ है। एसी के नीचे लगे बिजली के सॉकेट से चिंगारी निकलती रहती है। ठेकेदार का भुगतान न होने से फायर फाइटिंग पाइपलाइन भी शोपीस बनी हुई है। सांस के मरीजों के लिए यह लापरवाही जानलेवा हो सकती है।

लोगों का दर्द

बाहर से लेनी पड़ी दवा

अनीता श्रीवास, शिवनगर कॉलोनी का कहना है कि “मेरे पति एक सप्ताह से पीलिया के कारण भर्ती हैं। रविवार को कोई डॉक्टर देखने नहीं आया। अस्पताल में दवाएं उपलब्ध नहीं थीं, इसलिए बाहर से खरीदनी पड़ीं।”

डॉक्टर का इंतजार

किरण श्रीवास्तव, स्वजन कहना है कि “मेरी 85 वर्षीय मां भर्ती हैं। रविवार होने के कारण कोई डॉक्टर देखने नहीं आया। मजबूरी में बाहर से दवाएं खरीदनी पड़ीं।

इनका कहना है

डा. मनीष शर्मा, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, भोपाल ने बताया कि “जेपी अस्पताल में सफाई और दवाओं की उपलब्धता को लेकर समय-समय पर निर्देश दिए जाते हैं। यदि वाटर कूलर के पास गंदगी या बिजली के सॉकेट में शॉर्ट सर्किट की समस्या है, तो उसे तत्काल ठीक कराया जाएगा। रविवार को भी रोस्टर के अनुसार डॉक्टरों की ड्यूटी रहती है। मैं स्वयं समीक्षा कर कार्रवाई सुनिश्चित करूंगा।”

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