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खाड़ी देशों में जंग की आहट, भारतीय इत्र कारोबार की खुशबू पड़ी फीकी, 40% तक नुकसान

 

 भोपाल। खाड़ी देशों में जंग की आहट ने सदियों पुराने इत्र के कारोबार को भी फिक्र में डाल दिया है। अरब की धरती से उठने वाली खुशबू का यह कारोबार पूरी दुनिया में फैला हुआ है और हिंदुस्तान भी इसका बड़ा बाजार माना जाता है। लेकिन मौजूदा हालात में जंग और तनाव की वजह से इस कारोबार की रौनक कुछ फीकी पड़ती दिखाई दे रही है।

प्रमुख व्यापारिक केंद्रों पर संकट

दरअसल खाड़ी के सऊदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात, ओमान और कतर इत्र, ऊद और अंबर के बड़े व्यापारी केंद्र माने जाते हैं। खासतौर पर दुबई और जेद्दा की मंडियों से हर साल करोड़ों रुपये का इत्र दुनिया के कई देशों में एक्सपोर्ट किया जाता है।

लेकिन मौजूदा जंगी हालात के चलते आयात-निर्यात और समुद्री आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे इस कारोबार की रफ्तार थम सी गई है।

सप्लाई चेन और कीमतों पर असर

कारोबारियों का कहना है कि इत्र बनाने में इस्तेमाल होने वाला ऊद, अंबर, कस्तूरी और कई तरह के खुशबूदार तेल बड़े पैमाने पर खाड़ी के बाजारों से ही आते हैं। जंग के हालात में जहाजों की आवाजाही कम होने, बीमा और ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ने तथा बंदरगाहों पर कड़ी सुरक्षा के कारण इनकी सप्लाई प्रभावित हो रही है। इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है और बाजार में इत्र महंगा होता जा रहा है।

तहज़ीब और परंपरा का हिस्सा

अरब मुल्कों और मुस्लिम समाज में इत्र महज़ एक खुशबू नहीं बल्कि तहज़ीब और रिवायत का अहम हिस्सा है। वहां जुमे की नमाज़, ईद, निकाह और दूसरे खास मौकों पर ऊद और अंबर की खुशबू लगाना आम बात है। यही वजह है कि दुबई और मक्का मदीना जाने वाले लाखों जायरीन भी इत्र और ऊद खरीदकर अपने मुल्कों में ले जाते हैं।

स्थानीय कारोबारियों की चिंता

भोपाल के कमला पार्क इलाके में इत्र के कारोबारी अल्तमश जलाल बताते हैं कि खालिस इत्र कन्नौज से और ऊद आसाम से आता है, लेकिन हमारे कई इम्पोर्टेड ब्रांड खाड़ी मुल्कों से ही आते थे, जो इन दिनों पूरी तरह रुक गए हैं।

उनका कहना है कि मौजूदा हालात में न माल जा रहा है और न ही आ रहा है, जिससे कारोबार ठहर सा गया है। इस बार ईद पर खास महक नहीं रहेगी।

कारोबार में भारी गिरावट

वहीं जहांगीराबाद के इत्र कारोबारी सुगंध सलाहकार यूसुफ खान कहते हैं कि एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट लगभग बंद है और हमारे कई ऑर्डर पेंडिंग पड़े हैं। पैसा भी फंसा हुआ है। जो कारोबारी पूरी तरह गल्फ देशों के लिए इत्र का काम करते हैं, उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

उनका कहना है कि भारतीय इत्र बाजार को करीब 40 प्रतिशत तक नुकसान झेलना पड़ रहा है, क्योंकि इत्र का सबसे बड़ा बाजार खाड़ी मुल्क ही हैं।

रमज़ान के सीज़न पर सन्नाटा

यूसुफ के मुताबिक हर साल रमज़ान के दौरान 15 रमज़ान तक कारोबार लगभग 35 प्रतिशत तक बढ़ जाता था, लेकिन इस बार यह बढ़ोतरी केवल 8 प्रतिशत तक ही पहुंच पाई है। बाजार में रौनक कम है और दुकानों में खुशबू की जगह सन्नाटा ज्यादा महसूस हो रहा है।

अमन की उम्मीद

हालांकि कारोबारियों को उम्मीद है कि हालात जल्द बेहतर होंगे और खाड़ी इलाकों में अमन कायम होने के साथ ही खुशबू का यह पुराना कारोबार फिर से अपनी रफ्तार पकड़ लेगा। क्योंकि दुनिया भर में इत्र के दीवानों के लिए यह महज़ खुशबू नहीं, बल्कि सदियों पुरानी एक सांस्कृतिक विरासत है, जिसकी महक आज भी कायम है।

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