अग्रसर इंडिया ब्यूरो | भोपाल मध्य प्रदेश में महिला सुरक्षा के दावों और हकीकत के बीच की खाई गहरी होती जा रही है। विधानसभा के पटल पर रखे गए सरकारी आंकड़े एक खौफनाक तस्वीर पेश कर रहे हैं। वर्ष 2020 से जनवरी 2026 के बीच प्रदेश से 2,70,300 महिलाएं और बेटियां गायब हुई हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि पुलिस अब तक 50,170 का सुराग लगाने में नाकाम रही है।
प्रतिदिन का औसत: 125 महिलाएं लापता, हर घंटे 5 परिवारों की खुशियां छिन रहीं कांग्रेस विधायक डॉ. विक्रांत भूरिया के सवाल के लिखित जवाब में सरकार ने जो जानकारी साझा की है, वह प्रदेश की सामाजिक और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि प्रदेश में प्रतिदिन औसतन 125 महिलाएं और बेटियां लापता हो रही हैं।
अग्रसर इंडिया डेटा विजुअलाइजेशन: साल दर साल गहराता संकट लापता होने वाली महिलाओं और बालिकाओं की संख्या में प्रतिवर्ष 4 से 8 हजार की भयावह बढ़ोतरी दर्ज की गई है:
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2020: 31,405
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2022: 43,148
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2024: 50,798
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2025: 54,897 (रिकॉर्ड वृद्धि)
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2026 (28 जनवरी तक): 4,197
बड़ा सवाल: कारण जानने में पुलिस विभाग क्यों पिछड़ा? जांच में यह तथ्य सामने आया है कि गायब होने वाली 48% बेटियां (बालिकाएं) घर से नाराज होकर जाती हैं। लेकिन वयस्क महिलाओं के मामले में स्थिति और भी संदेहास्पद है।
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हैरानी की बात: पुलिस मुख्यालय (PHQ) के पास इस बात का कोई राज्यस्तरीय विश्लेषण (State Level Analysis) ही उपलब्ध नहीं है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं गायब क्यों हो रही हैं?
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तस्करी की आशंका: ठोस डेटा और विश्लेषण के अभाव में यह अंदेशा गहरा जाता है कि क्या इन गुमशुदगी के पीछे कोई संगठित मानव तस्करी (Human Trafficking) गिरोह तो सक्रिय नहीं है?
लापता VS बरामद: 50 हजार से ज्यादा अब भी ‘लापता’ | श्रेणी | कुल लापता | बरामद/लौटीं | अभी भी लापता |
| :— | :— | :— | :— | | महिलाएं | 2,06,507 | 1,58,523 | 47,984 | | बालिकाएं | 63,793 | 61,607 | 2,186 |
अग्रसर इंडिया विश्लेषण: क्यों बढ़ रहे हैं ये मामले? 1. संवादहीनता: बालिकाओं के मामलों में घर के भीतर बढ़ता मानसिक दबाव और संवाद की कमी मुख्य वजह उभर कर आई है।
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प्रशासनिक विफलता: 50 हजार से अधिक महिलाओं का अब तक न मिल पाना पुलिस के सर्च ऑपरेशन और इंटेलिजेंस नेटवर्क की कमजोरी को दर्शाता है।
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डिजिटल जोखिम: सोशल मीडिया के माध्यम से झांसे में लेकर घर से बुलाने के मामलों में भी वृद्धि देखी गई है।
निष्कर्ष: ये आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि समाज के टूटते ताने-बाने और सुरक्षा तंत्र की विफलता का प्रमाण हैं। प्रदेश में केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन मूल कारणों पर प्रहार करना होगा जिसके चलते हर घंटे 5 बेटियां अपना घर छोड़ने को मजबूर हैं।




