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पढ़ा-लिखा युवा ऑनलाइन जुआ की भेंट चढ़ा, पुणे के बीटेक ग्रेजुएट ने ‘कैरियर’ बनाया ट्रेनों में चोरी का

मुंबई, ०६ फरवरी। एक शिक्षित युवक का जीवन ऑनलाइन जुए की गिरफ्त में आकर कैसे बर्बादी की राह पर चल पड़ता है, इसकी एक चौंकाने वाली मिसाल पुणे से सामने आई है। रेलवे पुलिस ने एक ऐसे शख्स को गिरफ्तार किया है, जिसने पुणे विश्वविद्यविद्यालय से मरीन इंजीनियरिंग (बीटेक) की डिग्री हासिल की थी और एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी नौकरी करता था। मगर ऑनलाइन बेटिंग एप्स की लत ने उसे करोड़ों के सपने देखने वाले इस इंजीनियर से ट्रेनों का चोर बना दिया।

गिरफ्तार आरोपी की पहचान २८ वर्षीय रोहन शर्मा (बदला हुआ नाम) के रूप में हुई है। पुलिस के अनुसार, शर्मा ने अपनी नौकरी के दौरान ही ऑनलाइन जुए और सट्टेबाजी के ऐप्स का शिकार होना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे यह आदत एक गहरी लत में बदल गई, जिसमें वह अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा डूबाता चला गया।

“जीतने का चस्का लगा, फिर उधार लेकर भी खेलने लगा,” एक वरिष्ठ रेलवे पुलिस अधिकारी ने बताया, “जब उसकी अपनी बचत खत्म हुई, तो उसने दोस्तों और रिश्तेदारों से उधार लेना शुरू किया। आखिरकार वह करीब दस लाख रुपये के आसपास का जुआ हार गया। कर्ज के बोझ और शर्मिंदगी से बचने के लिए, उसने त्वरित पैसा कमाने का रास्ता अपनाया और लंबी दूरी की ट्रेनों में सफर करने वाले यात्रियों की चोरी करने लगा।”

आरोपी शर्मा अपनी पढ़ाई और पेशेवर पृष्ठभूमि का इस्तेमाल चोरी की सुनियोजित कार्यवाही में करता था। वह अच्छे कपड़े पहनकर, एक सामान्य यात्री की तरह एसी कोच में सफर करता और रात के समय सोए हुए यात्रियों के सामान या बैग से कीमती सामान चुरा लेता था।

मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विशेषज्ञों ने इस घटना पर गहरी चिंता जताई है।

  • डॉ. अनिता देसाई, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट: “यह मामला ऑनलाइन गेमिंग और बेटिंग की लत के गंभीर मनोवैज्ञानिक प्रभावों को उजागर करता है। यह लत नशे की तरह काम करती है, जहां व्यक्ति हारने के बावजूद ‘बड़ी जीत’ के भ्रम में पड़कर और पैसा लगाता रहता है। इससे न केवल वित्तीय बर्बादी आती है, बल्कि नैतिक अवसाद और आत्म-सम्मान में गिरावट भी आती है, जो व्यक्ति को गैर-कानूनी रास्तों पर धकेल सकती है। शिक्षित युवा वर्ग इसकी चपेट में तेजी से आ रहे हैं।”

  • अविनाश शेट्टी, साइबर लॉ एक्सपर्ट: “यह घटना ऑनलाइन बेटिंग प्लेटफॉर्म्स के अवैध और अनियंत्रित ऑपरेशन की ओर भी इशारा करती है। इन ऐप्स का मनोवैज्ञानिक हेराफेरी से भरा डिजाइन युवाओं को फंसाता है। इन पर कड़े कानूनी नियंत्रण और सार्वजनिक जागरूकता की सख्त जरूरत है।”

पुलिस ने शर्मा से कई हाई-एंड मोबाइल फोन और लैपटॉप बरामद किए हैं, जिन्हें वह चोरी करके बेच देता था। उसके खिलाफ मुंबई, पुणे और गोवा मार्ग की कई ट्रेनों में हुई चोरियों के मामले दर्ज हैं।

निष्कर्ष:

रोहन शर्मा का मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि एक सामाजिक चेतावनी है। यह दर्शाता है कि ऑनलाइन जुए की बढ़ती सुगमता किस तरह प्रतिभाशाली युवाओं के भविष्य को खतरे में डाल सकती है। इस घटना से शिक्षित वर्ग में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने, ऑनलाइन लत से निपटने के लिए परामर्श सेवाओं के विस्तार और इन अवैध प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की तात्कालिक आवश्यकता रेखांकित होती है।

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