भोपाल। भोपाल के सरकारी और निजी अस्पतालों में इन दिनों मरीजों की भारी भीड़ है। लेकिन चिंता की बात बीमारी नहीं, बल्कि उसका इलाज है। नवदुनिया की टीम ने शहर के दो बड़े अस्पतालों की ओपीडी में पहुंचकर उन मरीजों के पर्चों की पड़ताल की, जो सामान्य सर्दी, खांसी या बदन दर्द की शिकायत लेकर आए थे।
पड़ताल में सामने आया कि लगभग 70 प्रतिशत मरीजों को पहले ही दिन से ”एंटीबायोटिक्स” की भारी खुराक दी जा रही है, जिसकी शायद जरूरत ही नहीं थी।
कहां आया मामला
जेपी अस्पताल : हल्का बुखार और गला खराब। बैरसिया से आए संतोष कुमार (32 वर्ष) को पिछले दो दिन से हल्का बुखार था। डाक्टर ने उन्हें ”सिफिक्सिम” नामक एंटीबायोटिक लिख दी।
संतोष ने कहा कि डाक्टर साहब ने कहा है कि यह गोली लोगे तो जल्दी ठीक हो जाओगे। हमें नहीं पता यह एंटीबायोटिक है या क्या, बस बुखार उतरना चाहिए।
खान शाकिर अली अस्पताल : पुराना भोपाल निवासी 24 वर्षीय युवती सीमा केवल वायरल जुकाम की शिकायत लेकर पहुंचीं। उनके पर्चे पर ”एजीथ्रोमाइसिन” लिखी हुई थी। सीमा ने बताया कि पिछली बार भी डाक्टर ने यही दवा दी थी, इससे तुरंत आराम मिल जाता है। इसलिए मैंने खुद भी डाक्टर से कहा कि कोई ”बड़ी वाली” गोली लिख दें ताकि अपना काम कर सकूं।
डॉक्टर बोले- मरीजों को चाहिए तुरंत आराम
अस्पताल के ओपीडी में तैनात एक जूनियर डाक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हजारों की ओपीडी होती है। अगर हम मरीज को सिर्फ पैरासिटामोल और भाप लेने की सलाह दें, तो उसे लगता है कि डाक्टर ने ध्यान नहीं दिया। वे अगले दिन फिर आकर बहस करते हैं कि आराम नहीं मिला। इस दबाव में हमें अक्सर एंटीबायोटिक्स लिखनी पड़ती हैं।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
डॉ. प्रितेश सिंह ठाकुर, जनरल फिजिशियन, खान शाकिर अली अस्पताल का कहना है कि बिना डाक्टर की सलाह एंटीबायोटिक नहीं लेनी चाहिए। वायरल संक्रमण में एंटीबायोटिक असरदार नहीं होती। वायरल बीमारी तीन-चार दिन में ठीक हो जाती है। जरूरत पड़ने पर खून की जांच के बाद ही एंटीबायोटिक लें।विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की चेतावनी के अनुसार, अगर एंटीबायोटिक्स का ऐसा ही अंधाधुंध इस्तेमाल जारी रहा, तो साल 2050 तक दुनिया में कैंसर से ज्यादा मौतें एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (एएमआर) के कारण होंगी।




