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एम्स भोपाल की फार्मेसी में 70% दवाएं नहीं, मरीज बाहर से महंगे दामों पर खरीदने को मजबूर

एग्रसर इंडिया (AgrasarIndia)

भोपाल / स्वास्थ्य डेस्क

एम्स भोपाल में स्वास्थ्य सेवाओं पर बड़ा संकट: जन औषधि और अमृत फार्मेसी में 70% दवाएं गायब, कैंसर-डायबिटीज के मरीज महंगे दामों पर बाहर से खरीदने को मजबूर

भोपाल: देश के प्रतिष्ठित स्वास्थ्य संस्थानों में शुमार अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) भोपाल में मरीजों की परेशानी बढ़ती जा रही है। संस्थान की जन औषधि और अमृत फार्मेसी में जीवन रक्षक दवाओं की भारी किल्लत बनी हुई है, जिसके चलते ओपीडी में आने वाले 10 में से लगभग 7 मरीजों को डॉक्टरों द्वारा लिखी गई पर्ची की दवाएं बाहर के निजी मेडिकल स्टोर्स से खरीदनी पड़ रही हैं। पिछले दो महीनों से दवाइयों की सप्लाई ठप होने के कारण गरीबों और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

मुख्य बिंदु (Highlights)

  • 70% दवाएं अनुपलब्ध: ‘नईदुनिया’ की पड़ताल में सामने आया कि एम्स के भीतर संचालित जन औषधि केंद्र और अमृत फार्मेसी में एंटीबायोटिक, ब्लड प्रेशर (बीपी), डायबिटीज (मधुमेह) और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की जरूरी दवाइयां पूरी तरह आउट ऑफ स्टॉक हैं।

  • आयुष्मान कार्ड धारकों को भी राहत नहीं: नियमानुसार आयुष्मान भारत योजना के तहत मरीजों को सभी दवाइयां मुफ्त मिलनी चाहिए, लेकिन स्टॉक न होने के कारण इन कार्ड धारकों को भी दर-दर भटकना पड़ रहा है। बैरसिया से आई एक कैंसर मरीज की बेटी सुनीता साहू ने बताया कि डॉक्टर ने ‘ट्रैस्टुजुमैब’ (Trastuzumab) इंजेक्शन लिखा था, जो एम्स की फार्मेसी में नहीं मिला। बाहर यही इंजेक्शन 45 हजार रुपये में खरीदना पड़ रहा है।

  • दो महीने से ठप है सप्लाई: फार्मेसी स्टाफ का कहना है कि पिछले दो महीनों से मुख्य सप्लाई नहीं पहुंची है, हालांकि एक सप्ताह के भीतर स्टॉक सामान्य होने का दावा किया जा रहा है, लेकिन तब तक मरीजों की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही हैं। सीहोर से आए रामस्वरूप यादव और कोलार की रेहाना बी ने भी अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया कि उन्हें हर बार बाहर से ही दवाइयां खरीदनी पड़ती हैं।

  • निजी मेडिकल संचालकों की बल्ले-बल्ले: एम्स परिसर के बाहर स्थित निजी मेडिकल स्टोर्स पर मरीजों की लंबी भीड़ लग रही है। जेनरिक और अमृत फार्मेसी में दवा न मिलने का फायदा उठाकर निजी संचालक मनमाने दाम वसूल रहे हैं, जिससे गरीब मरीजों की जेब पर हर महीने 2,000 से 5,000 रुपये तक का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।

  • प्रशासनिक प्रतिक्रिया: इस पूरे मामले पर एम्स भोपाल के अधीक्षक डॉ. विकास गुप्ता का कहना है कि अमृत फार्मेसी और प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र सीधे तौर पर एम्स भोपाल प्रबंधन के अधीन संचालित नहीं होते, बल्कि ये केंद्र सरकार की अलग योजनाओं के तहत परिसर में संचालित होते हैं।

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