कैंसर के इलाज में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली सस्ती कीमोथेरेपी दवा ‘सिसप्लेटिन’ की भारी कमी के कारण मरीजों पर आर्थिक बोझ काफी बढ़ गया है। इसकी वजह …और पढ़ें

बाजार में कैंसर की जरूरी दवा ‘सिसप्लेटिन’ की किल्लत (सांकेतिक तस्वीर)
HighLights
- बाजार में कैंसर की जरूरी दवा ‘सिसप्लेटिन’ की किल्लत
- कच्चे माल की बढ़ती कीमतों से महंगी हुई दवा
- सिसप्लेटिन दवा का उत्पादन दोबारा शुरू हो चुका है
भोपाल। कैंसर के इलाज में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली सस्ती कीमोथेरेपी दवा ‘सिसप्लेटिन’ की भारी कमी के कारण मरीजों पर आर्थिक बोझ काफी बढ़ गया है। बाजार में इस दवा की शॉर्टेज होने की वजह से डॉक्टरों को मजबूरी में इसका महंगा विकल्प ‘कार्बोप्लेटिन’ इस्तेमाल करना पड़ रहा है, जिसकी कीमतों में भी 48 फीसदी तक का भारी उछाल आया है।
दवा उद्योग से जुड़े जानकारों के मुताबिक, इस संकट की मुख्य वजह दवा को तैयार करने वाले कच्चे माल (API) की कीमतों में आई रिकॉर्ड तेजी है। वर्ष 2025 के अंत तक सिसप्लेटिन का कच्चा माल करीब 3,900 रुपये प्रति ग्राम था, जो फरवरी 2026 तक बढ़कर लगभग 8,000 रुपये प्रति ग्राम तक पहुंच गया। इसके चलते दवा की उत्पादन लागत काफी बढ़ गई।
राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) द्वारा तय की गई मूल्य-सीमा (प्राइस कैपिंग) के कारण दवा कंपनियों के लिए इतनी महंगी लागत पर उत्पादन करना घाटे का सौदा साबित हो रहा था, जिसके चलते कई कंपनियों ने इसका उत्पादन कम कर दिया और बाजार में इसकी भारी किल्लत हो गई।
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, ये दोनों ही प्लेटिनम-बेस्ड कीमोथेरेपी दवाएं हैं, लेकिन अलग-अलग शारीरिक स्थिति वाले मरीजों को दी जाती हैं। सिसप्लेटिन उन मरीजों के लिए बेहद असरदार मानी जाती है जिन्हें किडनी या आंतों की गंभीर बीमारी नहीं होती। वहीं, किडनी के मरीजों के लिए कार्बोप्लेटिन को ज्यादा सुरक्षित विकल्प माना जाता है।
सिसप्लेटिन की अनुपलब्धता के कारण अब ओवरी, फेफड़े, सिर और गर्दन के कैंसर से जूझ रहे सामान्य मरीजों को भी महंगी कार्बोप्लेटिन से कीमोथेरेपी करानी पड़ रही है। वर्तमान में सिसप्लेटिन (50 mg) की कीमत बढ़कर 572 रुपये और कार्बोप्लेटिन (450 mg) की कीमत 4,287 रुपये तक पहुंच गई है, जिससे कई कीमो साइकिल वाले मरीजों का बजट पूरी तरह बिगड़ गया है।
सिसप्लेटिन का उत्पादन दोबारा शुरू
हालांकि, मरीजों के लिए एक राहत भरी खबर भी है। मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. श्याम अग्रवाल के अनुसार, दवा का उत्पादन दोबारा शुरू हो चुका है और बाजारों व अस्पतालों में सप्लाई को सामान्य किया जा रहा है। फिलहाल गंभीर और तत्काल कीमोथेरेपी की जरूरत वाले मरीजों को प्राथमिकता के आधार पर यह दवा दी जा रही है। उम्मीद जताई जा रही है कि अगले 15 से 20 दिनों के भीतर सिसप्लेटिन की यह शॉर्टेज पूरी तरह से दूर हो जाएगी।




