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भोपाल के तालाब-पहाड़ियों पर मंडराया खतरा? Master Plan-2047 में 50-33 मीटर के पुराने नियम हटे

एग्रसर इंडिया (AgrasarIndia) भोपाल डेस्क टीम

भोपाल मास्टर प्लान-2047 के नए ड्राफ्ट पर उठे गंभीर सवाल: जल-स्रोतों और पहाड़ियों की सुरक्षा के कड़े मीटर-नियम हटे, अफसरों की मनमानी और अतिक्रमण का बढ़ा खतरा

भोपाल: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के आगामी 20-25 वर्षों के विकास का खाका तैयार करने वाले ‘भोपाल मास्टर प्लान-2047’ के नए प्रारूप को लेकर पर्यावरणविदों और शहरी मामलों के विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता जताई है। नए ड्राफ्ट में तालाबों, नदियों, नहरों और पहाड़ियों के संरक्षण से जुड़े पुराने सख्त नियमों को काफी ढीला कर दिया गया है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि 1995 के पुराने मास्टर प्लान में निर्माण कार्य के लिए जो निश्चित दूरी ‘मीटर’ में तय थी, उसे नए ड्राफ्ट से हटाकर केवल ‘इको-सेंसिटिव जोन’ का हवाला दे दिया गया है, जिससे मैदानी स्तर पर अधिकारियों के व्यक्तिगत विवेक और मनमानी की गुंजाइश बढ़ गई है।

मुख्य बिंदु (Highlights)

  • निश्चित मीटर का पैमाना गायब, इको-सेंसिटिव जोन का हवाला: वर्ष 1995 के मास्टर प्लान में पर्यावरण संरक्षण के लिए पानी के स्रोतों के किनारे निर्माण की दूरी अंकों (मीटर) में पूरी तरह स्पष्ट थी। इसके विपरीत, वर्ष 2047 के नए ड्राफ्ट से यह तय मीटर फार्मूला हटाकर केवल बड़े इको-सेंसिटिव जोन का सामान्य उल्लेख कर दिया गया है, जिससे भविष्य में जल-स्रोतों के किनारों पर कंक्रीट के जंगल और अतिक्रमण का अंदेशा गहरा गया है।

  • 1995 बनाम 2047 के नियमों में बड़ा अंतर:

    • बड़ा तालाब: पुराने प्लान में 50 मीटर तक निर्माण पर पूर्ण रोक थी, जबकि नए प्लान में निश्चित दूरी का जिक्र गायब है।

    • नदियां और जलाशय: पहले कालियासोत नदी, केरवा, शाहपुरा आदि से 33 मीटर की दूरी अनिवार्य थी, अब केवल बड़े जोन का नाम दर्ज है।

    • नहर और नाले: पहले मुख्य नहर से 30 मीटर और नालों से 3 मीटर का फासला जरूरी था, जो नए प्लान में स्पष्ट नहीं है।

    • पहाड़ियां: 1995 के प्लान में श्यामला हिल्स, अरेरा हिल्स, चार इमली और ईदगाह जैसी प्रमुख पहाड़ियों के नाम स्पष्ट रूप से दर्ज थे, जबकि नए ड्राफ्ट में नामवार सूची का अभाव है।

  • पहाड़ियों के संरक्षण को लेकर अनिश्चितता: पुराने प्लान में शहर की विशिष्ट पहाड़ियों के मूल स्वरूप को बचाने के लिए स्पष्ट निर्देश और नाम दिए गए थे। हालांकि नए ड्राफ्ट में ढलान (8.5 डिग्री) पर निर्माण रोकने की बात है, लेकिन सुरक्षित पहाड़ियों की कोई साफ सूची न होने से संरक्षण प्रभावित हो सकता है।

  • विशेषज्ञों की चेतावनी: शहरी मामलों के विशेषज्ञ प्रो. एचएम मिश्रा का कहना है कि नियमों में स्पष्ट दूरी न होने से अफसरों के व्यक्तिगत विवेक की भूमिका बढ़ जाएगी, जिससे पर्यावरण और प्राकृतिक धरोहरों को भारी नुकसान पहुंच सकता है। उन्होंने सरकार से पुराने सख्त और नापने योग्य नियमों को ही बहाल रखने की मांग की है।

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