एग्रसर इंडिया (AgrasarIndia) भोपाल डेस्क टीम
हमीदिया अस्पताल में प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा: टेंडर प्रक्रिया में देरी से दवाओं और सर्जिकल सामान की भारी किल्लत, मरीजों को जेब से खरीदने पड़ रहे हैं महंगे आइटम्स
भोपाल: मध्य प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में शुमार राजधानी भोपाल के हमीदिया अस्पताल में प्रबंधन की सुस्ती और प्रशासनिक लेटलतीफी के कारण मरीजों की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ गई हैं। टेंडर प्रक्रिया में अत्यधिक देरी के चलते अस्पताल में दवाओं, सर्जिकल सामग्री (सूचर मटेरियल), कंज्यूमेबल्स और पैथोलॉजी रीएजेंट्स की गंभीर कमी पैदा हो गई है। स्थिति यह है कि निश्शुल्क इलाज के दावों के बीच गरीबों को अपनी जेब से महंगे दाम पर बाहर के मेडिकल स्टोर से दवाएं और ऑपरेशन का सामान खरीदना पड़ रहा है।
मुख्य बिंदु (Highlights)
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मई का टेंडर, सितंबर तक तारीख: अस्पताल में दवाओं और कंज्यूमेबल्स की बल्क खरीदी के लिए मई माह में टेंडर जारी किया गया था, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती के कारण इसकी अंतिम तिथि बढ़ाकर 24 सितंबर तय की गई। महज कागजी और टेंडर प्रक्रिया पूरी होने में ही चार महीने से अधिक का समय बीत जाने से अस्पताल का सेंट्रल स्टोर लगभग खाली हो चुका है।
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ओपीडी से लेकर ओटी तक असर: अस्पताल के सेंट्रल स्टोर में जीवन रक्षक दवाइयों, टांके लगाने वाले धागे (सूचर), स्टेराइल ग्लव्स, कॉटन, पट्टियों और ब्लड प्रेशर की ड्रिप्स का स्टॉक खत्म हो चुका है। इसके अलावा खून व पेशाब की जांच (C&BC और बायोकेमिस्ट्री) में काम आने वाले केमिकल्स व रीएजेंट्स की कमी से पैथोलॉजी जांचें भी प्रभावित हो रही हैं।
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मरीजों की पीड़ा: राजगढ़, विदिशा और सीहोर से इलाज कराने आए मरीजों और उनके परिजनों ने बताया कि डॉक्टर द्वारा ऑपरेशन या इलाज की बात तो कही जा रही है, लेकिन अस्पताल से जरूरी सामान न मिलने के कारण उन्हें रात के वक्त भी बाहर की निजी दुकानों से 600 से 900 रुपये तक का सामान अपनी जेब से खरीदना पड़ रहा है।
किन चीजों की बनी हुई है सबसे ज्यादा किल्लत?
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सर्जिकल सामग्री: विभिन्न नंबरों के टांके वाले धागे (सूचर), सर्जिकल ग्लव्स और डिस्पोजेबल आइटम्स।
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दवाइयां: ओपीडी में दी जाने वाली मुख्य एंटीबायोटिक्स (जैसे एमाक्सिसिलिन, एजिथ्रोमाइसिन), पेनकिलर्स और कुछ महत्वपूर्ण इंजेक्शन।
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जांच सामग्री: पैथोलॉजी लैब में रक्त और अन्य सैंपलों की जांच में उपयोग होने वाले केमिकल्स और रीएजेंट्स।
अस्पताल प्रबंधन की इस ढुलमुल कार्यशैली के कारण दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले गरीब और असहाय मरीजों को भारी आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।




