Bhopal Breaking news Latest News MP Polictics

अब अमेरिकी-यूरोपीय नहीं, ‘देसी’ मानकों से जांचा जाएगा बच्चों का खून, एम्स भोपाल बनाएगा नया पैमाना

 

आईसीएमआर ने भारतीय बच्चों के लिए नई ब्लड रिपोर्ट मानक तय करने की पहल की है। एम्स भोपाल और रायपुर शोध करेंगे। इससे विदेशी पैमानों की जगह देसी मानक लागू …और पढ़ें

अब अमेरिकी-यूरोपीय नहीं, 'देसी' मानकों से जांचा जाएगा बच्चों का खून, एम्स भोपाल बनाएगा नया पैमाना

आईसीएमआर बच्चों के लिए नए भारतीय ब्लड मानक तय करेगा। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. आईसीएमआर बच्चों के लिए नए भारतीय ब्लड मानक तय करेगा।
  2. एम्स भोपाल और रायपुर को शोध की जिम्मेदारी मिली।
  3. विदेशी मानकों से गलत रिपोर्ट और इलाज की आशंका रहती थी।

भोपाल। क्या आपके बच्चे की ब्लड रिपोर्ट में हीमोग्लोबिन कम आया है? या कोई और जांच नार्मल नहीं है? हो सकता है कि आपका बच्चा पूरी तरह स्वस्थ हो, लेकिन जिस पैमाने (स्केल) पर उसकी जांच हुई है, वह पैमाना ही अपने बच्चों के लिए सही न हो। बच्चों का इलाज कर रहे डाक्टर लंबे समय से इस दुविधा का सामना कर रहे हैं।

अब भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) इस दुविधा को खत्म करने की तैयारी में जुट गया। आइसीएमआर ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल और एम्स रायपुर को भारतीय परिस्थितियों के अनुसार नया मानक तय करने के लिए शोध की जिम्मेदारी दी है। इस शोध परियोजना को टेरिप-2 नाम दिया गया है। इसके लिए 1.70 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।

 

एम्स भोपाल में पैथोलाजी विभाग की अध्यक्ष डॉ वैशाली वाल्के इस अध्ययन का नेतृत्व करेंगी। उन्होंने नईदुनिया को बताया कि हम मध्य भारत के बच्चों और किशोरों के खून के सैंपल लेकर यह तय करेंगे कि भारतीय बच्चे के लिए नार्मल रेंज क्या होनी चाहिए।

डॉ वाल्के ने बताया कि बड़ों (वयस्कों) के लिए देसी मानक बनाने का काम (टेरिप-1) पहले से चल रहा है, अब फोकस बच्चों पर है। इस शोध के परिणाम आने के बाद देश के हर लैब में बच्चों की रिपोर्ट भारतीय मापदंडों के अनुसार जांची जाएगी, जिससे उपचार अधिक प्रभावी और सुरक्षित होगा।

इस लिए जरूरी है यह बदलाव

  • अभी तक देश की पैथोलाजी लैब में खून की जांच के लिए जो रेफरेंस चार्ट (मानक) इस्तेमाल होते हैं, वे पश्चिमी देशों के बच्चों पर हुई रिसर्च पर आधारित हैं। इसमें अमेरिका या यूरोप के बच्चों का खान-पान, मौसम और शारीरिक बनावट (जेनेटिक्स) भारतीय बच्चों से बिल्कुल अलग है।
  • विदेशी मानकों के कारण कई बार भारतीय बच्चों की रिपोर्ट में गड़बड़ी दिखती है, जबकि वे स्वस्थ होते हैं। इसके चलते बच्चों को बेवजह दवाइयां खानी पड़ती हैं या फिर कई बार असली बीमारी पकड़ में ही नहीं आती।

ये होगा फायदा

सटीक इलाज : डॉक्टर को पक्के तौर पर पता होगा कि बच्चे को बीमारी है या नहीं। अंदाजे से इलाज नहीं होगा।

दवाइयों से मुक्ति : अगर बच्चे का प्वाइंट विदेशी चार्ट से थोड़ा ऊपर-नीचे है, लेकिन भारतीय चार्ट के हिसाब से सही है, तो उसे बेवजह दवाइयां नहीं खानी पड़ेंगी

सुरक्षित उपचार करेगा सुनिश्चित

बच्चों के स्वास्थ्य के लिए पश्चिमी देशों के डेटा पर निर्भरता खत्म कर अपने खुद के देसी मानक तैयार करना एक ऐतिहासिक कदम है। यह अध्ययन सही निदान और सुरक्षित उपचार सुनिश्चित करेगा, जिससे बेवजह की दवाओं और गलत इलाज पर रोक लगेगी। प्रो. डा. माधवानंद कर, कार्यपालक निदेशक, एम्स भोपाल

 

Please follow and like us:
Pin Share

Leave a Reply