भोपाल। प्राचीन ज्ञान परंपरा और बौद्धिक संपदा को सहेजने के लिए प्रदेश में ज्ञान भारतम् मिशन के तहत एक बड़ा अभियान शुरू गया है। इसके तहत जीर्ण-शीर्ण पांडुलिपियों का वैज्ञानिक संरक्षण और डिजिटलीकरण किया जाएगा। केंद्र सरकार ने यह मिशन पिछले साल शुरू किया था।
प्रदेश में संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय को नोडल एजेंसी बनाया गया है। प्रदेश में जिला कलेक्टरों के नेतृत्व में सर्वेक्षण का काम शुरू हो चुका है, जिसमे हर घर दस्तक अभियान चलाकर निजी संग्रहों और मठ-मंदिरों में छिपी पांडुलिपियों की पहचान की जानी है। इस कार्य में छह से आठ महीने लगने का अनुमान है।
पांडुलिपियां मिल जाने के बाद उनको संरक्षित करने का काम शुरू होगा। इस काम के लिए कर्मियों को उच्च स्तरीय प्रशिक्षण में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) का उपयोग करना सिखाया जाएगा। अधिकतर पांडुलिपियां हिंदी-संस्कृत के अतिरिक्त अन्य विलुप्त या कम प्रचलित भाषा में हो सकती हैं, इसलिए उनका भी प्रशिक्षण दिया गया है।
पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय संचालनालय के उप संचालक नीलेश लोखंडे का कहना है कि भारतीय ज्ञान की यह परंपरा केवल हवाओं में नहीं, बल्कि उन लाखों पांडुलिपियों में दर्ज है जो आज हमारे मंदिरों, मठों, पुस्तकालयों और निजी संग्रहों में धूल फांक रही हैं। इनका उपयोग व्यक्ति, समाज और देश हित में किया जा सकता है। यह बड़ी परियोजना है इसलिए इसमें सागर स्थित सेंटर आफ एक्सीलेंस डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय की भी मदद ली जा रही है।
आप भी कर सकते हैं योगदान
यदि किसी के घर में पूर्वजों द्वारा लिखी गई या संभालकर रखी गई कोई पांडुलिपि है तो संरक्षण के अभाव में वह नष्ट हो सकती है। इस मिशन के तहत उसे बचाया जा सकता है। कोई व्यक्ति अपने स्वामित्व की पांडुलिपि सरकार दे सकता है, जिसका संरक्षण और डिजिटलीकरण कर उसे मूल संरक्षित प्रति वापस कर दी जाएगी।
देश भर में 50 लाख पांडुलिपियों का अनुमानएक अनुमान के अनुसार, देश में 50 लाख से अधिक पांडुलिपियां हैं। इनमें दर्शन, आयुर्वेद, गणित, खगोल विज्ञान, साहित्य और वास्तुकला जैसे विषयों का अथाह भंडार है।
मिशन की शुरूआत हो चुकी है। हमने इसके लिए प्रदेश में स्थित पुस्तकालयों और विश्वविद्यालयों को भी पत्र लिखा है। अन्य विभागों से भी समन्वय कर कार्य कर रहे हैं। – डॉ मनीषा शर्मा, संयुक्त संचालक, पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय




