भोपाल डेस्क टीम
एम्स भोपाल में स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी दबाव: एमआरआई के लिए एक साल तो सीटी स्कैन के लिए 8-9 महीने की वेटिंग; डायलिसिस और सोनोग्राफी के भी बुरे हाल
भोपाल: मध्य प्रदेश के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे पड़ोसी राज्यों से बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर भोपाल आने वाले मरीजों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। एम्स भोपाल में संसाधनों की कमी और मरीजों की अत्यधिक भीड़ के चलते गंभीर जांचों और उपचार के लिए लंबी-लंबी कतारें और महीनों का इंतजार करना पड़ रहा है। हालात यह हैं कि कई मरीजों को एमआरआई के लिए एक साल बाद की तारीख दी जा रही है।
मुख्य बिंदु (Highlights)
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एमआरआई और सीटी स्कैन में लंबी वेटिंग: संस्थान में 1.5 टेस्ला की एक ही एमआरआई मशीन होने से रोजाना सिर्फ 33 मरीजों की जांच हो पा रही है, जिसके चलते मरीजों को एक साल बाद (जैसे अक्टूबर-जुलाई 2027) की तारीख मिल रही है। वहीं, 128 स्लाइस की दो सीटी स्कैन मशीनें 24 घंटे चलने के बावजूद रोज केवल 88 जांचें कर पा रही हैं और इसके लिए 8 से 9 महीने का इंतजार करना पड़ रहा है।
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डायलिसिस सेवाओं का संकट: नेफ्रोलॉजी विभाग में डायलिसिस के लिए सिर्फ 4 मशीनें उपलब्ध हैं। रोजाना 20 मरीज डायलिसिस के लिए पहुंच रहे हैं, लेकिन क्षमता कम होने के कारण केवल 8 मरीजों का ही डायलिसिस हो पाता है, जिससे बाकी लोगों को अगले दिन के लिए लौटना पड़ता है।
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सोनोग्राफी और एक्स-रे की स्थिति: सोनोग्राफी की 6 मशीनें होने के बावजूद हर दिन 215 जांचें होने के बाद भी 2 से 3 महीने की वेटिंग चल रही है। इसके अलावा डिजिटल एक्स-रे की चार मशीनों से प्रतिदिन लगभग 592 एक्स-रे हो रहे हैं, जिनकी रिपोर्ट मिलने में भी तीन दिन तक का समय लग रहा है।
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विशेषज्ञों की राय: वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट डॉ. शैलेष लुनावत का कहना है कि पीक सीजन में एम्स की रेडियोलॉजी ओपीडी 1200 से 1300 तक पहुंच जाती है, इसलिए मरीजों को समय पर राहत देने के लिए सीटी और एमआरआई मशीनों की संख्या बढ़ाना बेहद जरूरी है।




