न्यूयॉर्क/नई दिल्ली | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इजराइल यात्रा और वहां हुए रक्षा समझौतों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी हैं। पश्चिमी मीडिया के कई बड़े संस्थानों ने भारत की विदेश नीति पर प्रहार करते हुए ऐसी शब्दावली का इस्तेमाल किया है जिसने राजनयिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। कुछ रिपोर्टों में भारत के इजराइल के साथ संबंधों को ‘आत्मसमर्पण’ जैसा बताया गया है, जो सीधे तौर पर देश की संप्रभुता पर चोट है।
विवादित टिप्पणियां और ‘एपस्टीन फाइल’ का जिन्न
विदेशी सोशल मीडिया हैंडल्स और कुछ ‘लीक्ड’ रिपोर्टों के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि पश्चिमी एजेंसियां भारत पर दबाव बनाने के लिए पुरानी फाइलों का सहारा ले रही हैं।
-
अपमानजनक भाषा: अंतरराष्ट्रीय स्तर के कुछ पत्रकारों ने पीएम मोदी के लिए बेहद भद्दी और ‘अनपार्लियामेंट्री’ भाषा का इस्तेमाल किया है। इसमें भारत के इजराइल के साथ रक्षा सौदों को ‘मजबूरी’ और ‘अति-निर्भरता’ के रूप में पेश किया गया है।
-
एपस्टीन फाइल्स का जिक्र: सोशल मीडिया के डार्क कोनों में यह चर्चा फिर से तेज हो गई है कि क्या अंतरराष्ट्रीय मीडिया ‘जेफ्री एपस्टीन फाइल्स’ (Jeffrey Epstein Files) का नाम लेकर वैश्विक नेताओं पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है? हालांकि इन दावों का भारत से कोई सीधा संबंध अब तक प्रमाणित नहीं हुआ है, लेकिन विदेशी मीडिया द्वारा जानबूझकर ऐसे संवेदनशील मुद्दों के बीच भारत की चर्चा करना एक गहरी साजिश की ओर इशारा करता है।
क्यों हो रही है इतनी ‘बेइज्जती’?
-
एकतरफा झुकाव का आरोप: विदेशी मीडिया का दावा है कि भारत ने इजराइल के साथ ‘आयरन डोम’ समझौता करके मुस्लिम देशों के साथ अपने दशकों पुराने संतुलन को दांव पर लगा दिया है।
-
प्रोपगैंडा वॉर: न्यूयॉर्क टाइम्स और गार्जियन जैसे अखबारों ने भारत को एक ‘सहयोगी’ के बजाय एक ‘सब्सिडियरी’ देश के रूप में चित्रित करने की कोशिश की है, जो भारत की वैश्विक छवि के लिए बड़ा झटका है।



