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करोड़ों का बजट है, मशीनें है, पर इलाज नहीं! AIIMS भोपाल में ‘तारीख’ के इंतजार में 36 हजार कैंसर मरीज

 

भोपाल। स्वास्थ्य सुविधाओं का ‘शिखर’ कहे जाने वाले अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान भोपाल (AIIMS) में इन दिनों एक अजीब विरोधाभास है। यहाँ करोड़ों की लागत से आई विश्वस्तरीय मशीनें तो मौजूद हैं, लेकिन वे मरीजों की जान बचाने के बजाय धूल फांक रही हैं।

एम्स भोपाल में कैंसर और जटिल सर्जरी के लिए करोड़ों रुपये की अत्याधुनिक मशीनें पहुंच चुकी हैं, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती और तकनीकी अड़चनों के कारण मरीज अब भी इलाज के लिए भटकने को मजबूर हैं।

आलम यह है कि 2021-22 में शुरू हुए प्रोजेक्ट्स की डेडलाइन 5 बार बदली जा चुकी है, जिससे मध्य प्रदेश के हजारों कैंसर मरीजों का भविष्य अधर में लटका है।

मरीजाें काे नहीं मिल पा रही राहत

संस्थान में गामा नाइफ, पीईटी-सीटी और रोबोटिक सर्जरी यूनिट की स्थापना अंतिम चरण में होने के बावजूद इन सुविधाओं की शुरुआत बार-बार टल रही है। इन सुविधाओं से हर साल करीब 36 हजार कैंसर मरीजों को राहत मिलने की उम्मीद है, लेकिन फिलहाल मरीज निजी अस्पतालों में भारी खर्च उठाने या दिल्ली जैसे बड़े शहरों का रुख करने को मजबूर हैं।

 

करोड़ों खर्च, लेकिन सुविधाएं अधूरी

एम्स में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए भारी बजट खर्च किया जा रहा है। नार्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के सहयोग से 30 करोड़ रुपये की लागत वाला दा विंची रोबोटिक आर्म सिस्टम लगाया जा रहा है, जो यूरोलॉजी और जटिल सर्जरी में उपयोगी होगा।

हालांकि स्पाइन सर्जरी के लिए 21 करोड़ रुपये का रोबोट कार्यरत है, लेकिन मुख्य रोबोटिक सेंटर अब भी टेंडर और तकनीकी सेटअप में उलझा हुआ है।

151 करोड़ का कैंसर ब्लॉक भी अधूरा

गामा नाइफ और पीईटी-सीटी मशीनों के लिए बनाए जा रहे सेंट्रलाइज्ड कैंसर ब्लॉक पर लगभग 151 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है। इसके बावजूद मरीजों को अभी तक इन सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

पांच बार बदली गई डेडलाइन

इन परियोजनाओं की शुरुआत 2021-22 में हुई थी, लेकिन अब तक डेडलाइन केवल कागजों में बदलती रही है। गामा नाइफ प्रोजेक्ट की समयसीमा पांच बार बदली जा चुकी है। पहले इसे 2024 तक शुरू होना था, लेकिन अब 2026 के अंत तक टाल दिया गया है।

वहीं पीईटी-सीटी की डेडलाइन भी दो बार बढ़ाई जा चुकी है। दूसरी ओर रोबोटिक सर्जरी यूनिट में 2023 से प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद उपकरणों की खरीदी पूरी नहीं हो सकी है।

क्लीयरेंस और ट्रेनिंग बनी बड़ी बाधा

देरी का सबसे बड़ा कारण परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड से न्यूक्लियर सेफ्टी क्लीयरेंस न मिलना बताया जा रहा है। गामा नाइफ जैसे रेडियोसर्जरी उपकरण बिना अनुमति शुरू नहीं किए जा सकते।

इसके अलावा मशीनों को संचालित करने के लिए सुपर-स्पेशलाइज्ड टेक्नीशियनों की कमी, डॉक्टरों की अधूरी ट्रेनिंग और विशेष बंकर व कूलिंग सिस्टम तैयार करने में देरी भी वजह बनी हुई है।

मरीजों को क्या फायदा मिलता?

गामा नाइफ: बिना चीरा लगाए ब्रेन ट्यूमर का इलाज संभव होता और मरीजों को कम दर्द व जल्दी डिस्चार्ज मिलता।

पीईटी-सीटी: कैंसर की स्टेज और फैलाव की सटीक जांच एम्स में हो पाती, लेकिन मरीज निजी अस्पतालों में महंगी जांच कराने को मजबूर हैं।

रोबोटिक सर्जरी: जटिल ऑपरेशन अधिक सटीकता और कम जोखिम के साथ किए जा सकते थे, लेकिन रोबोट खरीद प्रक्रिया अब भी अधर में है।

साल के अंत तक शुरू करने का दावा

गामा नाइफ, पीईटी-सीटी और रोबोटिक सर्जरी जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं शुरू करने के लिए प्रक्रिया तेजी से जारी है। डॉक्टरों और टेक्नीशियनों की ट्रेनिंग दी जा रही है। हमारी योजना है कि इस साल के अंत तक इन तीनों महत्वपूर्ण सुविधाओं को मरीजों के लिए शुरू कर दिया जाए। – डॉ. विकास गुप्ता, अधीक्षक, एम्स भोपाल।

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