धनंजय प्रताप सिंह, डिप्टी पॉलिटिकल एडिटर (स्टेट), मध्य प्रदेश। भोपाल में मॉडल-अभिनेत्री और कार्पोरेट प्रोफेशनल रही ट्विशा शर्मा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत आत्महत्या हो या हत्या, लेकिन यह हमारी सामाजिक व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर रही है।
ट्विशा अब दुनिया में नहीं हैं इसलिए पूरा सच शायद ही कभी सामने आ पाए। प्रथमदृष्टया यह बात तो स्पष्ट हो गई है कि ट्विशा के साथ हुआ व्यवहार एक संस्कारित परिवार में शायद ही कभी होता। उनकी शादी मात्र छह महीने भी नहीं चल पाई और अब वह इस दुनिया में नहीं हैं। इसके कारणों पर सारे समाज को ही चिंतन करना चाहिए।
दोषी कौन है, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना यह विचार करना कि आधुनिक समाज में कैसे भी शादी बचाने के विचार ने ट्विशा की जान ले ली। ट्विशा पर शादी टूटने की रूढ़िवादी सोच या कहें कि पारिवारिक-सामाजिक दबाव नहीं होता तो शायद आज वह जीवित होती।
ट्विशा की मौत ने उजागर कर दिया कि आधुनिक, आत्मनिर्भर होने के बावजूद भारत जैसे सनातनी देश में आज भी महिलाएं वैवाहिक प्रताड़ना और सामाजिक खोखलेपन का शिकार हो रही हैं।
घटना ने परिवार नामक व्यवस्था, समाज और कानून तीनों को कठघरे में खड़ा किया है। यदि ट्विशा के पिता का यह कहना सही है कि हनीमून के दौरान ही उसके साथ दुर्व्यवहार होने लगा था लेकिन वह इसलिए सब सहती रही कि शादी एक झटके में टूट न जाए, तो फिर यह सोच बेटियों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।
परिवार और समाज, दोनों का यही दबाव रहता है कि सारे रिश्ते निभाने की जिम्मेदारी बेटी की ही है। प्रताड़ना झेलकर भी वह उफ न बोले। क्या आज के समय में यह संभव है? ट्विशा की ही बात की जाए तो वह योग्य और सफल बेटी थी।
जो बातें सामने आ रही हैं, वह तो संकेत दे रही हैं कि उसके चरित्र हनन का प्रयास मौत के बाद ही नहीं, पहले से वह इन आरोपों को झेल रही थी। गर्भावस्था, गर्भपात और उस पर भी सवाल….कुछ इस तरह की बातें ट्विशा के चैट में भी सामने आई हैं।
जब मायके वालों को मालूम था कि ट्विशा गर्भपात के बाद टूट गई है तो उसे मां- बाप को सहारा देना चाहिए था। लेकिन परिवार ने भी बेटी के नए घर पर ही सब निर्णय छोड़ दिए।
पुलिस की जांच तो संदिग्ध दिखाई दे ही रही है। वह पहले दिन से ही सास के पूर्व न्यायिक अधिकारी होने के भय से ग्रसित है। उसकी नजर में वही सच है, जो वह बता रही हैं। ट्विशा की मौत के बाद उसके पति समर्थ सिंह का फरार होना और सास द्वारा मीडिया के सामने आकर बहू को ड्रग एडिक्ट बताना, चरित्र हनन की कोशिश यह तो बताता ही है कि ससुराल पक्ष दूध का धुला तो नहीं है।
प्रदेश सरकार को भी यह सोचना चाहिए कि ट्विशा की मौत पर उठ रहे सवालों के कारण भोपाल और राज्य दोनों की बदनामी हो रही है। ऐसे में ट्विशा के शव का दोबारा पोस्टमार्टम करवाने या बाहरी एजेंसी से जांच करवाने में क्या दिक्कत है। ट्विशा के माता- पिता और भाई को इसी बात से संतुष्टि मिलती है तो सरकार को क्या परेशानी है।
वे इस भीषण गर्मी में न्याय के लिए लड़ रहे हैं। न्याय जहां से मिल सकता है, उन सभी दरवाजों पर दस्तक दे रहे हैं पर शायद सुनने वाला कोई नहीं है।
ट्विशा किसी की बेटी है, बहन है, वह भोपाल की बहू थी। ऐसी मृत्यु किसी अन्य बेटी की न हो, यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है। जब आरोप ऐसे परिवार पर हैं, जहां न्यायिक सेवा का प्रभुत्व है तो जांच एजेंसी का दबाव में होना स्वाभाविक है।
ऐसे हालात में जांच को तुरंत राज्य से बाहर या सीबीआइ की निगरानी में ट्रांसफर करने पर विचार करना चाहिए ताकि सिस्टम का दुरुपयोग न हो सके।
डिजिटल साक्ष्यों को कानूनी मान्यता मिल चुकी है तो पुलिस को भी वाट्सएप या इंस्टाग्राम पर भेजे गए मैसेज को एफआइआर में दर्ज करना चाहिए। इस पूरी कवायद को केवल किसी निर्दोष को फंसाने की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि दोषी की पहचान और सजा के रूप में देखा जाना चाहिए।
समाज को अपनी बेटियों को केवल यह नहीं सिखाना चाहिए कि शादी के बाद ससुराल ही उनका एकमात्र ठिकाना है बल्कि अपनी बेटियों को सिखाना होगा, आश्वस्त करना होगा कि जिंदगी शादी टूटने से अधिक महत्वपूर्ण है।
ट्विशा की मौत की लड़ाई केवल एक परिवार की नहीं बल्कि देश की हर उस बेटी की है, जो रसूख और रूढ़िवादिता के भंवर में फंसी हुई हैं।
यह केवल एक कानूनी मसला नहीं बल्कि हमारे समाज के चेहरे पर काला धब्बा है। यह घटना कह रही है कि हमारी सामाजिक सोच और परवरिश में सब कुछ सही नहीं है।




