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जहां नावें चलती थीं, वहां लोग पैदल चले, बड़ा तालाब सूखा तो तकिया टापू तक बन गई थी पगडंडी, भोपाल के लिए यह सिर्फ दृश्य नहीं एक चेतावनी थी

 

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यह प्रकृति का एक गंभीर संदेश था

यह दृश्य किसी अजूबे से कम नहीं था। शहरभर से लोग इसे देखने उमड़ पड़े। बच्चे, युवा और बुजुर्ग हर कोई उस रास्ते पर चलकर टापू तक पहुंचना चाहता था। कुछ लोगों के लिए यह रोमांच था, लेकिन संवेदनशील लोगों की नजरों में यह प्रकृति का एक गंभीर संदेश था।

भोपाल की लगभग 40 प्रतिशत आबादी की प्यास बुझाता है

करीब एक हजार वर्ष पहले राजा भोज द्वारा निर्मित यह विशाल जलाशय आज भी भोपाल की लगभग 40 प्रतिशत आबादी की प्यास बुझाता है। इसलिए जब इसका जलस्तर डेड स्टोरेज लेवल से भी नीचे पहुंच गया, तो चिंता केवल एक तालाब की नहीं थी, बल्कि पूरे शहर के भविष्य की थी।

हालांकि इस सूखे ने एक अनोखा दृश्य भी दिखाया। तालाब के किनारों और उभरी हुई जमीन पर ऐसे प्रवासी पक्षी दिखाई दिए, जो यहां सामान्यतः नहीं देखे जाते थे। ग्रेटर फ्लेमिंगो और कॉमन क्रेन जैसे दुर्लभ मेहमानों ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। मानो प्रकृति अपने तरीके से बता रही हो कि हर बदलाव के पीछे कोई कहानी छिपी होती है।

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2019 का दृश्य इसलिए इतिहास बन गया

पुराने भोपाल के लोगों को तब बीते दशकों की यादें भी ताजा हो गईं। वे बताते हैं कि 1960 के दशक और फिर 2002-03 के आसपास भी तालाब का पानी काफी पीछे हटा था। लेकिन 2019 का दृश्य इसलिए इतिहास बन गया क्योंकि पहली बार हजारों लोगों ने अपनी आंखों से तालाब के बीच बनी उस राह को देखा और उसकी तस्वीरों को दुनिया तक पहुंचाया।

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कई स्थानों पर हवन और प्रार्थनाएं भी हुईं

उस दौर में शहर की भावनाएं भी तालाब के साथ जुड़ गई थीं। अच्छी बारिश की उम्मीद में लोगों ने दुआएं मांगीं, नमाज अदा की। कई स्थानों पर हवन और प्रार्थनाएं भी हुईं। हर किसी की इच्छा एक ही थी कि बड़ा तालाब फिर से भर जाए और उसकी लहरें वापस लौट आएं।

और फिर मानसून आया। बारिश हुई। धीरे-धीरे पानी ने सूखी जमीन को फिर अपने आगोश में ले लिया। वह रास्ता, जिस पर चलकर लोग तकिया टापू तक पहुंच रहे थे, एक बार फिर पानी में खो गया।

यह केवल सूखे की कहानी नहीं

आज भी जब भोपाल के लोग उस दौर को याद करते हैं, तो यह केवल सूखे की कहानी नहीं लगती। यह एक शहर, उसके तालाब और पानी के साथ उसके भावनात्मक रिश्ते की कहानी है। एक ऐसी कहानी, जिसने सिखाया कि प्रकृति जब चेतावनी देती है, तो उसे सुनना जरूरी होता है, और जब वह मुस्कुराती है, तो पूरा शहर राहत की सांस लेता है।

राजा भोज द्वारा बनवाने की मान्यता

भोपाल के बड़ा तालाब की कहानी एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाती है। इसे 11वीं सदी में राजा भोज द्वारा बनवाने की मान्यता है। कहते हैं कि करीब एक हजार वर्ष पहले परमार वंश के महान शासक राजा भोज एक गंभीर त्वचा रोग से पीड़ित हो गए थे।

तमाम वैद्य और चिकित्सक उनकी बीमारी का उपचार नहीं कर सके। तभी एक संत ने उन्हें सलाह दी कि ऐसी जगह पर एक विशाल तालाब बनवाएं, जहां 365 जलधाराओं का पानी आकर मिले। संत का विश्वास था कि उस जल में स्नान करने से रोग दूर हो जाएगा।

राजा भोज ने अपने अभियंताओं को आदेश दिया और उपयुक्त स्थान की तलाश शुरू हुई। जब स्थल चुना गया तो वहां 359 जलधाराएं मिलीं। किंवदंती है कि एक गोंड प्रमुख कालिया ने छिपी हुई जलधाराओं का रास्ता बताया और तब जाकर 365 धाराओं का सपना पूरा हुआ। इसी के बाद उस विशाल जलाशय का निर्माण हुआ, जिसे आज दुनिया भोजताल के नाम से जानती है।

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यही वजह है कि इसे भोपाल की ‘लाइफ लाइन’ कहा जाता है

सदियां बीत गईं, राजवंश बदल गए, लेकिन भोजताल आज भी भोपाल की धड़कन बना हुआ है। लगभग 31 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली यह झील राजधानी की करीब 40 प्रतिशत आबादी को रोजाना लाखों गैलन पेयजल उपलब्ध कराती है। यही वजह है कि इसे भोपाल की ‘लाइफ लाइन’ कहा जाता है।

झील के एक किनारे आधुनिक भोपाल बसा है, तो दूसरे किनारे प्रकृति की खूबसूरती से भरा वन विहार राष्ट्रीय उद्यान है। सुबह की पहली किरण जब झील की लहरों पर पड़ती है, तो ऐसा लगता है मानो पूरा शहर पानी के आईने में अपनी तस्वीर देख रहा हो।

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शहर की पीढ़ियां इसके किनारे बड़ी हुई हैं

भोजताल सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, बल्कि भोपाल की संस्कृति और भावनाओं का हिस्सा है। शहर की पीढ़ियां इसके किनारे बड़ी हुई हैं। त्योहारों की रौनक, शाम की सैर, नावों की आवाजाही और दूर तक फैली नीली जलराशि भोपाल के जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। तालाब के बीच स्थित तकिया द्वीप और वहां मौजूद शाह अली शाह का मकबरा इसकी ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत को और समृद्ध बनाते हैं।

यह झील जैव विविधता का भी खजाना है

यह झील जैव विविधता का भी खजाना है। हर साल हजारों प्रवासी पक्षी यहां आते हैं। सफेद सारस, हंस और कई दुर्लभ प्रजातियां इस जलक्षेत्र को अपना अस्थायी घर बनाती हैं। झील में मछलियों, कछुओं और जलीय वनस्पतियों की सैकड़ों प्रजातियां पाई जाती हैं, जो इसे मध्य भारत के सबसे महत्वपूर्ण वेटलैंड्स में शामिल करती हैं। बड़ा और छोटा तालाब मिलकर जिस भोज वेटलैंड का निर्माण करते हैं, उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रामसर साइट का दर्जा भी प्राप्त है।

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आसपास के क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई

समय के साथ, बड़ा तालाब ने आसपास के क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज यह स्थान न केवल स्थानीय लोगों के लिए बल्कि पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। जहां वे नाव की सैर कर सकते हैं और प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद ले सकते हैं।

इस तरह, बड़ा तालाब का निर्माण केवल एक जलाशय के रूप में नहीं, बल्कि भोपाल की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

इस खूबसूरत कहानी का एक चिंताजनक अध्याय भी है

जिस भोजताल ने सदियों तक शहर को जीवन दिया, वह पिछले तीन दशकों में लगातार सिकुड़ता गया। कभी लगभग 39.8 वर्ग किलोमीटर में फैला यह जलक्षेत्र अब करीब 29.8 वर्ग किलोमीटर तक सिमट गया है। यानी 30 वर्षों में लगभग 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र कम हो गया।

विशेषज्ञों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि तालाब के कैचमेंट क्षेत्र में बढ़ते अतिक्रमण इसकी सबसे बड़ी वजह हैं। फार्म हाउस, रिसॉर्ट, मैरिज गार्डन और पक्के निर्माण धीरे-धीरे उन इलाकों में खड़े हो गए जहां कभी बारिश का पानी सीधे झील तक पहुंचता था। सीमांकन के लिए लगाई गई कई चेतावनी मुनारें तक उखाड़ दी गईं।

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(बड़ा तालाब की छाती पर बने अवैध निर्माण -फोटो नईदुनिया)

अब खुदको बचाने की पुकार लगा रही शहर की जीवनरेखा

भोपाल की पहचान सिर्फ उसकी इमारतों, सड़कों या इतिहास से नहीं है। इस शहर की असली पहचान उस विशाल जलराशि से है, जिसे लोग प्यार से बड़ा तालाब, भोजताल या अंग्रेजी में अपर लेक कहते हैं। यही वह झील है जिसने सदियों से भोपाल को जीवन दिया, उसकी संस्कृति को आकार दिया और उसकी प्यास बुझाई। लेकिन आज वही झील अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की सख्ती के बावजूद सीमांकन और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी। अब प्रशासन और जनप्रतिनिधि नए सर्वे, नए मास्टर प्लान और बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाने की बात कर रहे हैं।

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सवाल सिर्फ एक झील का नहीं, विरासत का है

सवाल सिर्फ एक झील का नहीं है। सवाल उस विरासत का है, जिसने हजार साल पहले एक राजा को स्वस्थ किया था और तब से लाखों लोगों का जीवन संवार रही है। भोजताल सिर्फ पानी का भंडार नहीं, बल्कि भोपाल की आत्मा है। यदि यह सिकुड़ता गया तो सिर्फ एक झील नहीं खोएगी, बल्कि भोपाल अपनी पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी खो देगा।

इसलिए आज जरूरत है कि इस हजार साल पुरानी धरोहर को बचाने के लिए समाज, प्रशासन और नागरिक मिलकर आगे आएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उसी गर्व से कह सकें, भोजताल है, तभी भोपाल है।

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