भोपाल । लंबे समय से कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का कैकेई राग जारी है। कभी कैबिनेट की बैठक से नदारद रहते हैं, तो कभी बोलते हैं कि मैं टेंपरेरी मंत्री हूं, कभी भी भूतपूर्व बन सकता हूं।
अक्सर यह कहते भी सुने गए कि उनकी कोई सुनता ही नहीं है। जब सरकार इंदौर के भागीरथपुरा कांड पर घिरी थी, तो उनके बयान ने मुसीबतें बढ़ा दी थीं। फिलहाल उनके नाम से जारी एक पत्र में ढाई वर्ष से इंदौर और उसके विकास की उपेक्षा पर तकलीफ का खुलासा हुआ है।
बड़ा सवाल है कि विजयवर्गीय स्वयं कैबिनेट मंत्री हैं, इंदौर उनका कर्म क्षेत्र है, लेकिन वह समझने को तैयार नहीं दिखते कि कााउंसिल ऑफ मिनिस्टर यानी कैबिनेट में अधिकार के मामले में मंत्रियों में ज्यादा अंतर नहीं होता है। विजयवर्गीय भी बतौर मंत्री उतने ही सक्षम हैं, आवश्यकता प्रबल इच्छा शक्ति की है।
मंत्री कैलाश विजयवर्गीय आए दिन असंतुष्ट भाव में जिस तरह रोना-धोना करते हैं, वह उनके लंबे राजनीतिक सफर पर भी प्रश्न चिह्न खड़े करता है। साथ ही यह संदेश भी मजबूत करता है कि वह हासिल किए हुए उत्तरदायित्व का निर्वहन नहीं कर पा रहे हैं। जनता के प्रति जवाबदेही में कमजोर पड़ रहे हैं।
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि कैलाश विजयवर्गीय अपना पद क्यों नहीं छोड़ देते? पद पर बने रहना, काम न होने की दुहाई देना और विरोध के नए-नए तरीके भी अपनाना, उनके लिए ज्यादा मुश्किलें खड़ी करेगा, बजाय सरकार या भारतीय जनता पार्टी को कठघरे में खड़ा करने के।
उन्हें यह भी समझना होगा कि लगभग ढाई दशक से प्रदेश में भाजपा की सरकार है और इसमें वह लंबे समय तक मंत्री भी रहे हैं, इंदौर के मेयर भी रह चुके हैं। ऐसे में जब वह इंदौर का विकास न होने की पीड़ा जताते हैं, तो सरकार से पहले वह खुद को सवालों के कठघरे में खड़ा कर लेते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, कुशाभाऊ ठाकरे, लाल कृष्ण आडवाणी और कैलाश जोशी जैसे नेताओं ने जिस अनुशासन के सांचे में भारतीय जनता पार्टी को ढाल दिया और इसे ही पार्टी का आधार बना दिया, उस दौर को भी विजयवर्गीय ने देखा है।
उन्होंने भी अनुशासन के दायरे में रहते हुए राजनीति की है। चार दशक से अधिक की राजनीतिक यात्रा के बाद उनका इस तरह का रवैया भाजपा के अनुशासन को सीधी चुनौती है।
कैलाश विजयवर्गीय की गिनती उन वरिष्ठ नेताओं में होती है, जो एक शब्द भी बिना विचारे नहीं बोलते, लेकिन ताज्जुब है कि उन्होंने यह जानते हुए कि लंबे समय से भाजपा की सरकार है, कह दिया कि इंदौर का विकास नहीं हुआ है। आंकड़े बताते हैं की वर्तमान में ही मालवांचल में 30,077 करोड़ रुपये से ज्यादा के काम चल रहे हैं। इंदौर के विकास में मेट्रो ट्रेन से लेकर मुंबई दिल्ली इकोनॉमिक कॉरिडोर तक कहीं कमी नहीं छोड़ी गई है।
लगभग 2,935 करोड़ रुपये लागत की इंदौर-उज्जैन सिक्स लेन रोड, दो प्रमुख शहरों को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण, 48.10 किलोमीटर लंबी ग्रीनफील्ड फोरलेन कॉरिडोर एक्सेस-कंट्रोल फोरलेन राजमार्ग परियोजना का शिलान्यास हुआ है। उज्जैन एयरस्ट्रिप के लिए 590 करोड़ की स्वीकृति दे दी गई है। मालवांचल के अन्य जिलों से भी इंदौर की कनेक्टिविटी बढ़ी है।
इंदौर ने ही देश में लंबे समय तक सबसे स्वच्छ शहर का तमगा हासिल किया है। जो इंदौर संस्कृति और पर्यावरण के संरक्षण के साथ बेहतरीन जीवन शैली सिखाए, उसे विकास में पीछे छूट जाना कैसे स्वीकार किया जा सकता है? इंदौर को जानने, समझने और जीने के बाद भी अगर कैलाश विजयवर्गीय इंदौर के विकास की दुहाई देते हैं, तो यह इंदौर वासियों के लिए भी दुख का विषय क्यों न हो?
दरअसल, वर्तमान की राजनीतिक परिस्थितियां देखें, तो कैलाश विजयवर्गीय के आए दिन बयान और विवाद स्पष्ट संकेत करते हैं कि वह महत्वाकांक्षाओं के अधूरेपन से परेशान हैं, जिसे वह इंदौर और प्रदेश के नाम पर जाहिर करना चाहते हैं। ऐसी कौन सी समस्या है, जो सरकार में रहते हुए भी समाधान के योग्य नहीं दिखाई देती? अब तो उनके आए दिन के विवादित बयानों पर इस्तीफा दे देने की जन प्रतिक्रिया सामान्य होती जा रही है। लोग मानते हैं कि यदि उन्हें कोई परेशानी है, तो सरकार में बने रहने का क्या औचित्य बचता है?
फिलहाल इन दिनों जो पत्र मीडिया में जारी हुआ है, उसे भी लेकर उन्होंने इंदौर के ही विकास का रोना रोया है। हालांकि सियासत का यह पुराना दांव है कि खुद ही पत्र जारी करो और बाद में मुकर जाओ। जो संदेश जहां तक पहुंचाना होता है, पत्र ‘कथित’ होकर भी अपना काम कर जाता है। फिलहाल तो कैलाश विजयवर्गीय इसे अपना पत्र करने से इन्कार कर रहे हैं, लेकिन उनको अपना संदेश जहां तक पहुंचाना था, वहां तक यह पत्र कथित होकर भी संदेश दे चुका है।
इन सारे विरोध के सभी स्वर में एक संदेश विजयवर्गीय के लिए भी स्पष्ट सुनाई देने लगा है कि सरकार में होते हुए भी यदि लाचारी महसूस हो तो प्रदेश और जनता के विकास के लिए खुद को पीछे हटाते हुए किसी और को मौका देना चाहिए। संभव है कि प्रदेश की जनता, विशेषकर इंदौर कैलाश विजयवर्गीय के ऐसे किसी कदम के इंतजार में हो।




