एग्रसर इंडिया (AgrasarIndia) भोपाल डेस्क टीम
मध्य प्रदेश में बढ़ते साइबर अपराध: एक वर्ष में ठगी का आंकड़ा 600 करोड़ रुपये के पार
भोपाल: मध्य प्रदेश में साइबर ठगी के मामलों में लगातार तेजी आ रही है। स्थिति यह है कि एक वर्ष के भीतर प्रदेश में साइबर ठगी का कुल आंकड़ा 600 करोड़ रुपये को पार कर चुका है। बढ़ते डिजिटल अपराधों के मुकाबले पुलिस के पास संसाधनों और अमले की भारी कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
मुख्य बिंदु (Highlights)
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बढ़ता आंकड़ा: प्रदेश में पिछले एक वर्ष के दौरान साइबर ठगी की कुल राशि 600 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। पिछले चार वर्षों में साइबर ठगी की इस राशि में 1100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।
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अमले और अधिकारों की कमी: पूरे प्रदेश में आईटी एक्ट (IT Act) के तहत मामलों की जांच का अधिकार केवल निरीक्षकों (Inspectors) के पास है, जिनकी कुल संख्या मात्र 19 है।
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सीमित थाने: प्रदेश में साइबर का मात्र एक थाना भोपाल में है, जबकि बाकी जिलों में जिला पुलिस के थानों में ही एफआईआर दर्ज की जाती है, जिससे विवेचना में देरी होती है।
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जटिल नेटवर्क: अधिकतर आरोपी मध्य प्रदेश से बाहर के होते हैं और म्यूल खातों में ठगी की राशि भेजते हैं; उनके पास न तो सही पता होता है और न ही सही मोबाइल नंबर।
जांच के मोर्चे पर बुनियादी समस्याएं
साइबर पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में 634 करोड़ रुपये की ठगी हुई थी, जिसमें से पुलिस ने सूझबूझ दिखाते हुए 137 करोड़ रुपये बैंकों में होल्ड कराए थे। इस वर्ष भी ठगी का आंकड़ा 600 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है और प्रतिवर्ष ढाई हजार से अधिक एफआईआर दर्ज की जा रही हैं। इसके बावजूद, प्रशासनिक स्तर पर कई बाधाएं हैं:
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कमजोर बल: वर्ष 2013 में साइबर पुलिस के लिए 293 अधिकारी-कर्मचारियों का अमला स्वीकृत किया गया था। वर्तमान में जिला पुलिस बल से प्रतिनियुक्ति पर आए कर्मचारियों को मिलाकर लगभग 300 पदस्थ हैं।
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कैडर का अभाव: साइबर पुलिस का अलग से कोई काडर ही नहीं है। हालांकि, पुलिस मुख्यालय के अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही साइबर पुलिस का अलग काडर बनाया जाएगा।
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लंबित प्रस्ताव: डिजिटल फोरेंसिक लैब सहित संसाधन बढ़ाने के कई प्रस्ताव शासन स्तर पर अभी भी लंबित हैं।
जांच में आती हैं ये तकनीकी चुनौतियां
साइबर भोपाल के एसपी प्रणय नागवंशी के अनुसार, साइबर ठगी की जांच आगे बढ़ाने के मुख्य रूप से तीन ही तरीके होते हैं— मोबाइल नंबर, बैंक खाता नंबर और इंटरनेट मीडिया अकाउंट.
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इंटरनेट मीडिया अकाउंट: इसके लिए संबंधित कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता है।
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मोबाइल और बैंक खाते: मोबाइल नंबर में यह जरूरी नहीं कि जिसके नाम सिम है, वही उसका असली उपयोगकर्ता हो; वह देश के किसी कोने का हो सकता है। इसी तरह फर्जी खातों का पता लगाने के लिए बैंकों से जानकारी लेनी होती है।
इन तमाम जटिलताओं और दस्तावेजों की छानबीन के जरिए वास्तविक उपयोगकर्ता की पहचान करने में लंबा समय लगता है।




