एग्रसर इंडिया (AgrasarIndia) भोपाल डेस्क टीम
भोपाल की अदालतों का अनूठा मामला: 32 हजार रुपये के विवाद को खत्म होने में लगे 47 साल, आखिरकार मेडिएशन से सुलझा मुकदमा
भोपाल: राजधानी भोपाल में न्याय मिलने की लंबी और सुस्त प्रक्रिया का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। महज 32,792 रुपये की वसूली के एक छोटे से विवाद को सुलझने में पूरे 47 साल का लंबा वक्त लग गया। वर्ष 1979 में एमपी स्टेट एग्रो और पीडी महेश्वरी के बीच शुरू हुआ यह कानूनी संघर्ष जिला अदालत से लेकर हाई कोर्ट तक भटका। अंततः 12 अगस्त 2026 को दोनों पक्षों की आपसी सहमति और मेडिएशन के जरिए इस ऐतिहासिक रूप से पुराने मामले का हमेशा के लिए अंत हो गया।
मुख्य बिंदु (Highlights)
-
वर्ष 1979 में शुरू हुआ था मुकदमा: एमपी स्टेट एग्रो ने पीडी महेश्वरी के खिलाफ 1979 में वसूली का यह केस दर्ज कराया था। उस वक्त इस मामले की पैरवी करने वाले अधिवक्ता आरके श्रीवास्तव अब इस दुनिया में नहीं हैं।
-
अदालत का फैसला और लंबी अपील: वर्ष 2000 में अदालत ने एमपी स्टेट एग्रो के पक्ष में फैसला सुनाते हुए 32,792 रुपये और 12% ब्याज के भुगतान का आदेश दिया था। इसके खिलाफ मामला 2004 में फिर जिला अदालत और बाद में जबलपुर हाई कोर्ट तक पहुंचा। करीब 20 साल तक विभिन्न अदालतों में चक्कर काटने के बाद अक्टूबर 2025 में हाई कोर्ट ने केस को वापस भोपाल की नवम अपर जिला अदालत में भेज दिया।
-
47 साल बाद 90 हजार में समझौता: नवम अपर जिला न्यायाधीश आशुतोष शुक्ला के सामने जब मामला पहुंचा, तो दोनों पक्षों के वकीलों (हार्दिक श्रीवास्तव और अर्पित महेश्वरी) की पहल पर मध्यस्थता (Mediation) का सहारा लिया गया। दोनों पक्ष लंबी अदालती लड़ाई को खत्म करने पर राजी हुए और 90 हजार रुपये के डिमांड ड्राफ्ट के साथ इस 47 साल पुराने मुकदमे का सुथरा समाधान निकल आया।
समय और मुद्रा के मोल का अंतर
यदि वित्तीय लिहाज से देखा जाए, तो 1979 के 32,792 रुपये की खरीद क्षमता आज के समय में लगभग 9.2 लाख रुपये के बराबर बैठती है। यदि इसे चक्रवृद्धि ब्याज (Compound Interest) के हिसाब से जोड़ा जाता, तो यह राशि लाखों रुपये पार कर सकती थी, लेकिन अंततः समझदारी दिखाते हुए दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से इस प्रकरण को समाप्त करना ही बेहतर समझा। भोपाल जिला न्यायालय के इतिहास में यह सबसे लंबे समय तक चलने वाले चुनिंदा मुकदमों में दर्ज हो गया है।




