एग्रसर इंडिया (AgrasarIndia) भोपाल डेस्क टीम
आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान पर विज्ञान की मुहर: भोपाल के आयुर्वेद कॉलेज के शोध में सामने आए 348 औषधीय पौधे, फार्माकोपिया में शामिल होने की जगी उम्मीद
भोपाल: मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचलों में जड़ी-बूटियों के जरिए होने वाले पारंपरिक उपचार को अब वैज्ञानिक मान्यता मिलने की दिशा में एक बहुत बड़ी सफलता मिली है। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा कराए गए और भोपाल के पंडित खुशीलाल शर्मा शासकीय आयुर्वेद कॉलेज द्वारा चार साल से अधिक समय तक किए गए शोध में यह बात सामने आई है कि आदिवासी समुदाय ऐसे 348 औषधीय पौधों का उपयोग कर रहे हैं, जिनका उल्लेख आयुर्वेद की भारतीय फार्माकोपिया में भी मिलता है। इस शोध की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान से 37 ऐसे विशेष पौधे मिले हैं, जो डायबिटीज, घाव भरने, बाल झड़ने, आर्थराइटिस और चर्म रोग जैसी कई गंभीर बीमारियों में बेहद कारगर हैं।
मुख्य बिंदु (Highlights)
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चार आदिवासी जिलों में हुआ शोध: मध्य प्रदेश के चार प्रमुख आदिवासी बहुल जिलों—डिंडोरी, मंडला, अनूपपुर और शहडोल में यह व्यापक शोध कार्य किया गया, जहां मुख्य रूप से गोंड और बैगा जनजाति के वैद्यों के ज्ञान का अध्ययन किया गया। यह आदिवासियों के पारंपरिक औषधीय ज्ञान पर अब तक का सबसे बड़ा शोध माना जा रहा है।
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37 में से 22 पौधों का मोनोग्राफ तैयार: खोजे गए 37 महत्वपूर्ण पौधों में से 22 औषधीय पौधों का मोनोग्राफ तैयार कर लिया गया है। मोनोग्राफ में पौधे की संरचना, विभिन्न भाषाओं में प्रचलित नाम, पहचान, सूक्ष्मदर्शीय लक्षण, रासायनिक घटक तथा भौतिक एवं रासायनिक मानकों को समाहित किया जाता है। हालांकि, पर्याप्त जानकारी न मिलने के कारण शेष 15 पौधों का मोनोग्राफ अभी तैयार नहीं हो पाया है।
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गुप्त रखे गए पौधे: शोध के दौरान यह भी सामने आया कि इन 37 पौधों के अलावा आदिवासी वैद्य कैंसर और सर्पदंश जैसी गंभीर बीमारियों के उपचार के लिए 24 अन्य पौधों का भी उपयोग कर रहे हैं, जिन्हें वे अपनी परंपरा के तहत गुप्त रखना चाहते हैं और उनके बारे में कोई जानकारी साझा नहीं करते।
प्रायोगिक और क्लीनिकल परीक्षण के बेहतरीन परिणाम
कॉलेज की सह प्राध्यापक और प्रोजेक्ट को-आर्डिनेटर डॉ. अंजलि जैन के अनुसार, शोध के तहत कुछ प्रमुख पौधों पर प्रायोगिक और क्लीनिकल अध्ययन किए गए, जिसके परिणाम बेहद उत्साहजनक रहे हैं:
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घाव भरने में असरदार (गोंदकतीरा/कुल्लू): वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया कि ‘गोंदकतीरा या कुल्लू’ (स्टर्कुलिया यूरेन्स) में घाव भरने की क्षमता एलोपैथी के प्रसिद्ध मल्हम ‘पोवीडोन आयोडीन’ से भी बेहतर है।
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बालों की वृद्धि (वन बरमसिया): ‘वन बरमसिया या दंडोतफला’ (ट्राइडेक्स प्रोकम्बेन्स) में बालों की वृद्धि करने की अचूक क्षमता देखी गई है।
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यूरिन इन्फेक्शन में मददगार (चिपकी): ‘चिपकी’ (ज़ैंथियम स्ट्रूमेरियम) में मूत्र विरेचनीय गुण पाए गए हैं, जो यूरिन इन्फेक्शन और किडनी से जुड़ी बीमारियों में बेहद उपयोगी साबित हो रहे हैं।
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पायलट क्लीनिकल अध्ययन: इसके अलावा ‘राजपिहरी/संजीवनी’, ‘लड़ियां या जारूल’, ‘दहिमन’ और ‘मीठी पत्ती’ सहित पांच पौधों का अलग-अलग 10 से 15 रोगियों पर पायलट क्लीनिकल अध्ययन किया गया, जिसके सकारात्मक परिणाम मिलने के बाद अब इन्हें बड़े समूह पर आजमाने की तैयारी है।
फार्माकोपिया में स्थान मिलने की उम्मीद
कॉलेज के प्राचार्य डॉ. उमेश शुक्ला ने बताया कि इन 37 पौधों को भारतीय आयुर्वेद फार्माकोपिया में स्थान दिलाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार की ओर से केंद्रीय आयुष मंत्रालय को प्रस्ताव भेजा जाएगा। यदि इन्हें फार्माकोपिया में जगह मिलती है, तो यह पारंपरिक आदिवासी चिकित्सा पद्धति के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होगा।




