एग्रसर इंडिया (AgrasarIndia)
पर्यावरण एवं स्वास्थ्य डेस्क
मध्य प्रदेश में पराली जलाने के मामलों ने पंजाब-हरियाणा को भी पीछे छोड़ा: देश में पहले पायदान पर पहुंचा राज्य, वायु प्रदूषण और सेहत पर मंडरा रहा बड़ा खतरा
भोपाल: देश में कृषि अपशिष्ट यानी पराली (Stubble Burning) जलाने के मामलों में मध्य प्रदेश ने पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों को भी पीछे छोड़ दिया है। उपग्रह (सैटेलाइट) आधारित आंकड़ों के अनुसार, पराली जलाने के मामलों में मध्य प्रदेश लगातार देश में पहले स्थान पर बना हुआ है। हालांकि हर साल सर्दियों की शुरुआत से पहले प्रशासनिक बैठकें होती हैं, एफआईआर और जुर्माने जैसी कार्रवाई की जाती है, लेकिन धरातल पर किसानों को पराली प्रबंधन के पुख्ता विकल्प न मिलने के कारण यह समस्या लगातार विकराल रूप धारण करती जा रही है।
मुख्य बिंदु (Highlights)
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देश में सर्वाधिक मामले मध्य प्रदेश में: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पोर्टल के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024 में मध्य प्रदेश में पराली जलाने के 16,074 और वर्ष 2025 में बढ़कर 17,067 मामले सामने आए, जो पूरे देश में सर्वाधिक हैं। इस वर्ष भी 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच 350 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं, जो यह संकेत देती हैं कि इस साल भी रिकॉर्ड मामले सामने आ सकते हैं।
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प्रमुख राज्यों की तुलना (वर्ष 2021 से 2025):
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मध्य प्रदेश: 2021 में 8,160 से बढ़कर 2025 में 17,067 पर पहुंचा।
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पंजाब: 2021 में 71,304 से घटकर 2025 में 5,114 मामलों पर आ गया।
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हरियाणा: 2021 में 6,984 से घटकर 2025 में मात्र 662 रह गया।
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उत्तर प्रदेश: 2021 में 4,242 से बढ़कर 2025 में 7,290 दर्ज हुआ।
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फेफड़ों की क्षमता पर गंभीर असर: भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज के छाती एवं श्वास रोग विभाग के सह प्राध्यापक डॉ. पराग शर्मा के अनुसार, पराली के धुएं और कोहरे (स्मोग) के कारण वायु गुणवत्ता (AQI) बेहद खराब श्रेणी में पहुंच जाती है। लगातार 15 वर्ष तक ऐसे प्रदूषित माहौल में रहने वाले व्यक्ति के फेफड़ों की कार्यक्षमता 50 प्रतिशत तक कम हो सकती है। स्मोग के सीजन में ओपीडी में मरीजों की संख्या 25% तक बढ़ जाती है, जिससे एलर्जी, अस्थमा और निमोनिया का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
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विकल्पों का अभाव: जानकारों का मानना है कि केवल प्रशासनिक सख्ती और जुर्माने से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। जब तक सरकार किसानों को पराली प्रबंधन के लिए प्रभावी और किफायती मशीनरी या व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध नहीं कराएगी, तब तक सैटेलाइट डेटा में नजर आने वाले इन आंकड़ों पर लगाम लगाना मुश्किल होगा।




