एग्रसर इंडिया (AgrasarIndia)
टेक्नोलॉजी डेस्क
स्पेस से धरती पर रात में सूरज की रोशनी बिखेरने की तैयारी: अमेरिकी कंपनी ने मिलाया भारत की ‘स्काईरूट’ से हाथ, विक्रम रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे सैटेलाइट्स
नई दिल्ली: अंतरिक्ष तकनीक की दुनिया में एक बेहद अनोखा और क्रांतिकारी कदम उठाया जाने लगा है। अमेरिका के एक स्टार्ट-अप ने अंतरिक्ष से रात के समय धरती पर सूरज की रोशनी पहुंचाने वाले अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के लिए भारत की प्रमुख प्राइवेट स्पेस कंपनी ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ (Skyroot Aerospace) के साथ एक बड़ी डील साइन की है। इस साझेदारी के तहत अमेरिकी कंपनी ‘रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल’ के दो सैटेलाइट्स को भारत के स्वदेशी ‘विक्रम’ रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित किया जाएगा।
मुख्य बिंदु (Highlights)
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रात के वक्त चमकेगी कृत्रिम धूप: ‘रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल’ स्पेस में ऐसे सैटेलाइट्स का एक पूरा नेटवर्क तैयार करने में जुटी है, जो जरूरत पड़ने पर रात के वक्त भी दुनिया के किसी भी हिस्से में तुरंत रोशनी (धूप) पहुंचा सकेंगे। इसका सबसे बड़ा फायदा बाढ़, भूकंप या अन्य प्राकृतिक आपदाओं से घिरे उन इलाकों में होगा, जहां अंधेरे के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन चलाने में भारी मुश्किलें आती हैं।
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सोलर पावर और डिफेंस को बढ़ावा: रात के वक्त भी धूप मिलने से सोलर पावर प्लांट्स में बिजली उत्पादन का समय काफी हद तक बढ़ाया जा सकेगा। इसके अलावा, दूर-दराज के औद्योगिक इलाकों में बिना रुकावट काम जारी रखने, सैन्य ऑपरेशंस के लिए जरूरी ठिकानों को रोशन करने और बड़े सार्वजनिक आयोजनों को शानदार बनाने में भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकेगा।
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स्काईरूट के विक्रम रॉकेट बनेंगे जरिया: इस डील के मुताबिक, अमेरिकी कंपनी का पहला सैटेलाइट स्काईरूट के ‘विक्रम-1’ रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। वहीं, दूसरे सैटेलाइट को नए उन्नत ‘विक्रम-1यू’ रॉकेट से लॉन्च किया जाएगा, जिसके पहले चरण में एक्स्ट्रा बूस्टर लगाए गए हैं ताकि इसकी क्षमता और बेहतर हो सके।
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सीईओ पवन चंदना ने जताई खुशी: स्काईरूट एयरोस्पेस के सीईओ पवन चंदना ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा है कि स्पेस टेक्नोलॉजी के जरिए ऑन-डिमांड धूप पहुंचाने के इस अनूठे सपने को अपने रॉकेट से पूरा करने का उन्हें बेसब्री से इंतजार है।
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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और रूस का प्रयोग: अंतरिक्ष से धरती पर रोशनी भेजने का यह विचार नया नहीं है। इससे पहले साल 1993 में रूस के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष की कक्षा में 65 फुट चौड़ा एक बड़ा शीशा लगाकर ‘जनामया’ नाम का एक सफल परीक्षण किया था, हालांकि बाद में फंड की कमी के कारण यह प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ सका था।
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पर्यावरण और बायोलॉजिकल क्लॉक पर चिंता: रात में स्पेस से कृत्रिम धूप बेचने के इस प्लान पर पर्यावरण संगठनों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अंतरिक्ष से आने वाली तेज रोशनी से जंगली जानवरों, खगोलीय अनुसंधान और इंसानों की नेचुरल बायोलॉजिकल क्लॉक पर विपरीत असर पड़ सकता है। हालांकि, रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल के सीईओ बेन नोवाक का कहना है कि वे वैज्ञानिकों और स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर ही इस पर आगे बढ़ेंगे।




