एग्रसर इंडिया (AgrasarIndia)
राज्य डेस्क / विशेष विश्लेषण
व्यवस्था की संवेदना और शराब माफिया का साम्राज्य: 17,681 करोड़ के आबकारी राजस्व के मोह में कब तक कुचलती रहेंगी जिंदगियां?
भोपाल: सागर के बंडा में दर्जनों घरों के बुझते चिराग, देवास में जहरीली शराब से गई तेरह जिंदगियां, और अब अवैध शराब का ट्रक रोकने पर एक जांबाज थाना प्रभारी को दिनदहाड़े कुचलकर मार डाले जाने की घटना—इन दर्दनाक हादसों ने एक बार फिर पूरे सिस्टम को झकझोर कर रख दिया है। हर बार की तरह इस बार भी प्रशासनिक संवेदनाएं कुछेक तबादलों और मुआवजे की घोषणाओं तक सिमटकर रह गई हैं। जब राज्य में ‘रक्षक’ ही सड़क पर रौंदे जा रहे हों और जनता जहरीली शराब पीने को विवश हो, तो यह सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है कि आखिर सरकार की ऐसी कौन सी मजबूरी है जो उसे इस बेलगाम माफिया के आगे घुटने टेकने पर मजबूर करती है?
मुख्य बिंदु (Highlights)
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17,681 करोड़ रुपये का भारी-भरकम आबकारी राजस्व: इस पूरी व्यवस्थागत विफलता का सबसे कड़वा सच वित्तीय वर्ष 2025-26 के आंकड़े हैं, जहां सरकार की तिजोरी में शराब से आने वाला राजस्व बढ़कर 17,681 करोड़ रुपये के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच चुका है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा (करीब 14 करोड़ प्रूफ लीटर) अकेली देसी शराब का है। लोकलुभावन योजनाओं के भारी-भरकम खर्चों को पूरा करने के लिए सरकार के लिए यह ‘लिकर रेवेन्यू’ सबसे आसान जरिया बन गया है।
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राजस्व भरपाई के नैतिक विकल्प: जानकारों का मानना है कि यदि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो केवल रेत और खनिज के अवैध उत्खनन की लीकेज रोककर ही सालाना 7 से 8 हजार करोड़ रुपये जुटाए जा सकते हैं। इसके अलावा, महाकाल लोक की तर्ज पर ओरछा, चित्रकूट और टाइगर टूरिज्म को बढ़ावा देकर तथा जीएसटी चोरी पर डिजिटल नकेल कसकर इस वित्तीय घाटे को आसानी से पाटा जा सकता है। बिहार जैसे सीमित संसाधनों वाले राज्य द्वारा शराबबंदी लागू किए जाने का उदाहरण सामने होने के बावजूद मध्य प्रदेश इस दिशा में कदम बढ़ाने से क्यों झिझक रहा है, यह बड़ा सवाल है।
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फाइलों में धूल फांकती SIT की सिफारिशें: साल 2020 के उज्जैन कांड (16 मौतें), 2021 के मुरैना कांड (24 मौतें) और मंदसौर में हुई मौतों के बाद वरिष्ठ आईएएस डॉ. राजेश राजौरा के नेतृत्व में गठित तीन SIT ने कई अहम सिफारिशें की थीं—जैसे इंडस्ट्रियल स्पिरिट की जीपीएस ट्रैकिंग, अभेद्य होलोग्राम, खरीदार के लिए अनिवार्य बिल और पड़ोसी राज्यों के समानांतर शराब के दाम रखना। हालांकि, ये सभी सिफारिशें आज भी लाल फीताशाही और फाइलों में धूल फांक रही हैं।
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बढ़ता राजस्व लक्ष्य और माफिया को बढ़ावा: विडंबना यह है कि मध्य प्रदेश सरकार का आबकारी राजस्व लक्ष्य 2025-26 के 17,500 करोड़ से बढ़ाकर 2026-27 में 20,279 करोड़ रुपये कर दिया गया है। शराब दुकानों के आरक्षित मूल्य में 20 प्रतिशत की वृद्धि की गई है। जब एक तरफ महंगी वैध शराब और दूसरी तरफ सस्ती अवैध शराब का बाजार उपलब्ध हो, तो इस अंतर का पूरा लाभ केवल शराब माफिया ही उठाता है।
सिस्टम की रगों में उतरा भ्रष्टाचार
वर्ष 2021 में जहरीली शराब से मौत पर ‘फांसी’ का कानून तो बना दिया गया, लेकिन लचर विवेचना और कमजोर पैरवी के चलते आज तक एक भी सिंडिकेट सरगना को सजा नहीं मिल सकी है। हकीकत यह है कि असली जहर केवल शराब की बोतल के मेथेनाल में नहीं, बल्कि आबकारी और पुलिस तंत्र के भीतर चल रही उस ‘मंथली व्यवस्था’ और सांठगांठ में घुला है, जो बिना राजनीतिक संरक्षण के संचालित नहीं हो सकती।
अब समय आ गया है कि सरकार इस दिशा में निर्णायक कदम उठाए—चाहे वह चरणबद्ध शराबबंदी की ओर बढ़ना हो, बड़े पैमाने पर सामाजिक जनजागरण चलाना हो, या फिर आबकारी व पुलिस की संयुक्त और निष्पक्ष टास्क फोर्स बनाकर माफिया का संपूर्ण सफाया करना हो। जनता अब केवल मुआवजे के मरहम से संतुष्ट होने वाली नहीं है, उसे ठोस और स्थायी प्रशासनिक सुधार चाहिए।




