भोपाल। मध्य प्रदेश में सरकारी विभागों और निगम-मंडलों में जनता की गाढ़ी कमाई कैसे खर्च हो रही है और सरकार ने विधानसभा में जो वादे किए थे वे पूरे हुए या नहीं, इसकी समीक्षा करने वाली महत्वपूर्ण विधानसभा समितियां खुद ही निष्क्रिय साबित हो रही हैं।
बड़ी लापरवाही: सालभर में सिर्फ एक बैठक, नए सभापति का खाता भी नहीं खुला
रिपोर्ट के अनुसार, विधानसभा की सबसे महत्वपूर्ण समितियों में से एक ‘सार्वजनिक उपक्रम समिति’, जो सरकारी निगम-मंडलों के कामकाज और वित्तीय मामलों की समीक्षा करती है, उसकी स्थिति बेहद चिंताजनक है:
उषा ठाकुर का कार्यकाल: तत्कालीन सभापति उषा ठाकुर के पूरे साल के कार्यकाल में इस समिति की सिर्फ एक बैठक बुलाई गई।
सुरेंद्र पटवा का कार्यकाल: नए सभापति सुरेंद्र पटवा के आने के बाद से अब तक समिति की एक भी बैठक नहीं हो सकी है।
महिला बाल विकास समिति: अर्चना चिटनिस की अध्यक्षता में बनी इस समिति की स्थिति भी ऐसी ही रही, जहां बैठकों का भारी अभाव देखा गया।
इन्होंने किया बेहतर काम
लोकलेखा समिति (पीएसी): अध्यक्ष भंवर सिंह शेखावत की अगुवाई में इस समिति ने साल 2004 से लंबित पड़े प्रतिवेदनों (रिपोर्ट्स) का निपटारा किया।
आश्वासन समिति: इस समिति ने भी लंबे समय से लंबित पड़े सरकारी आश्वासनों को पूरा कराने में तेजी दिखाई।
पिछला रिकॉर्ड: इससे पहले जब यशपाल सिंह सिसौदिया सार्वजनिक उपक्रम समिति के सभापति थे, तब सबसे ज्यादा प्रतिवेदन निपटाए गए थे।
4.5 लाख करोड़ रुपये के बजट की निगरानी के लिए बनेगी नई कमेटी
मध्य प्रदेश सरकार के करीब साढ़े चार लाख करोड़ रुपये के विशाल बजट की पाई-पाई पर नजर रखने के लिए अब जल्द ही विधायकों की एक नई कमेटी बनाई जाएगी। इसे ‘बजट मॉनिटरिंग कमेटी’ कहा जा सकता है। वर्तमान में मध्य प्रदेश विधानसभा में बजट के सही परीक्षण के लिए ऐसी कोई स्थाई समिति मौजूद नहीं है।
समितियों के कामकाज को बेहतर बनाने के लिए 11 प्रमुख सुझाव
पीठासीन अधिकारियों की कमेटी द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट में विधानसभा समितियों की कार्यप्रणाली को पटरी पर लाने के लिए निम्नलिखित कड़े सुझाव दिए गए हैं:
बैठकों का कैलेंडर तय हो: समितियों की बैठकों की संख्या पहले से निर्धारित होनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर, मध्य प्रदेश में तत्कालीन पीएसी अध्यक्ष रहे ब्रजेंद्र सिंह राठौर ने हर महीने की 10, 20 और 30 तारीख को बैठक का कैलेंडर तय किया था। ऐसा ही नियम हर जगह लागू हो।
कोरम और अधिकारियों की उपस्थिति अनिवार्य हो: बैठक शुरू करने के लिए न्यूनतम सदस्यों (विधायकों) की उपस्थिति अनिवार्य की जाए। सामान्य स्थिति में 11 में से कम से कम 4 सदस्य और विशेषाधिकार के मामलों में 5 से 6 सदस्यों की मौजूदगी जरूरी हो। साथ ही, विभागीय अधिकारियों का मौखिक साक्ष्य के लिए उपस्थित रहना अनिवार्य किया जाए।
सिफारिशों पर कड़ी कार्रवाई: समितियों द्वारा दी गई रिपोर्ट और सुझावों पर सरकार के विभागों को गंभीरता से कार्रवाई करनी होगी, क्योंकि आमतौर पर विभाग इसमें रुचि नहीं लेते हैं।
विधेयकों की समीक्षा: विधानसभा में पेश होने वाले कानूनी विधेयकों को पारित करने से पहले गहन जांच के लिए समितियों के पास भेजने की प्रक्रिया बनाई जाए।
अध्ययन दौरों की समीक्षा: समितियों द्वारा किए जाने वाले दौरों के बाद धरातल पर क्या वास्तविक कार्रवाई हुई, इसका कड़ाई से मूल्यांकन किया जाए।




