एग्रसर इंडिया (AgrasarIndia) भोपाल डेस्क टीम
न्याय प्रणाली में देरी: भारतीय न्याय संहिता (BNS) लागू होने के दो साल बाद भी मध्य प्रदेश में ‘सामुदायिक सेवा’ की सजा के नियम नहीं हुए अधिसूचित
भोपाल: देश में नए आपराधिक कानून लागू हुए दो साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन मध्य प्रदेश में इसे लेकर एक बड़ी प्रशासनिक सुस्ती सामने आई है। बीएनएस (BNS) के तहत छोटे अपराधों के लिए एक सुधारात्मक दंड के रूप में शामिल की गई ‘सामुदायिक सेवा’ (Community Service) की सजा को लागू करने के लिए राज्य में अब तक नियम अधिसूचित नहीं किए जा सके हैं। जबकि महाराष्ट्र जैसे अन्य राज्यों ने इस दिशा में नवंबर 2025 में ही नियम अधिसूचित कर इन्हें प्रभावी बना दिया है।
मुख्य बिंदु (Highlights)
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एक जुलाई 2024 से लागू हुआ था कानून: देश भर में नया आपराधिक कानून यानी भारतीय न्याय संहिता (BNS) एक जुलाई 2024 से प्रभावी हुआ था। इसमें पहली बार जेल और जुर्माने के विकल्प के रूप में ‘सामुदायिक सेवा’ को एक वैधानिक सजा के तौर पर शामिल किया गया था, जिसे केंद्र सरकार ने छोटे अपराधों के लिए सुधारात्मक दिशा में एक बड़ा कदम बताया था।
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बीएनएस की धारा-4 में प्रावधान: बीएनएस की धारा 4 में कुल छह प्रकार की सजाओं का उल्लेख है—मृत्युदंड, आजीवन कारावास, कारावास, संपत्ति की जब्ती, जुर्माना और सामुदायिक सेवा। इसके तहत न्यायालयों को यह अधिकार मिलता है कि वे कुछ विशेष मामलों में दोषी को जेल भेजने के बजाय समाजहित में कार्य करने की सजा सुना सकें।
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बीएनएसएस की धारा 23 का दायरा: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 23 के अनुसार, सामुदायिक सेवा का तात्पर्य ऐसे कार्य से है जो न्यायालय दोषी से समाज के लाभ के लिए करवाए और जिसके बदले उसे कोई पारिश्रमिक (वेतन) न मिले।
किन छह अपराधों में मिल सकती है सामुदायिक सेवा की सजा?
कानून के तहत निम्नलिखित छह छोटे और विशिष्ट अपराधों में यह सुधारात्मक सजा दिए जाने का प्रावधान है:
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लोक सेवक द्वारा अवैध रूप से व्यापार करना (धारा 202)
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अदालत की उद्घोषणा के बावजूद उपस्थित न होना (धारा 209)
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लोक सेवक को वैध शक्ति के प्रयोग से रोकने के लिए आत्महत्या का प्रयास (धारा 226)
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5,000 रुपये से कम मूल्य की चोरी का प्रथम बार अपराध और संपत्ति की वापसी
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सार्वजनिक स्थान पर नशे की हालत में दुर्व्यवहार (धारा 355)
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मानहानि का मामला (धारा 356(2))
नियमों के अभाव में अटकी व्यवस्था
सामुदायिक सेवा के तहत सार्वजनिक स्थानों की साफ-सफाई, पर्यावरण संरक्षण या सामाजिक संस्थाओं में श्रमदान जैसे सुधारात्मक कार्य कराए जाने हैं, जिससे दोषी को अपने कृत्य का अहसास हो सके। हालांकि, कौन सा काम कितने घंटे और कितने दिन कराया जाएगा तथा इसकी निगरानी कौन एजेंसी करेगी, इन तमाम दिशानिर्देशों को तय करने का अधिकार राज्य सरकारों के पास है। मध्य प्रदेश में नियमों के अभाव के चलते अदालतें चाहकर भी इस नए प्रावधान का प्रभावी उपयोग नहीं कर पा रही हैं।




