एग्रसर इंडिया (AgrasarIndia) भोपाल डेस्क टीम
एनजीटी की सख्त कार्रवाई: बागमुगलिया और आसपास की कॉलोनियों में सीवेज समस्या पर नगर निगम को फटकार, 1999-2000 में जमा विकास राशि 6% ब्याज सहित लौटाने के निर्देश
भोपाल: राजधानी भोपाल के बागमुगलिया स्थित प्रियदर्शिनी कॉलोनी और उसके आसपास के क्षेत्रों में फैली सीवेज की गंभीर समस्या को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए हैं। एनजीटी ने 26-27 साल पहले (वर्ष 1999-2000 में) बाहरी विकास और सीवेज कनेक्टिविटी के लिए जमा कराई गई राशि के बावजूद आज तक लाइन न बिछाए जाने पर गहरी नाराजगी जताई है और मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं।
मुख्य बिंदु (Highlights)
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एनजीटी का कड़ा रुख: वार्ड-53 के पार्षद प्रताप वारे द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने नगर निगम को 1999-2000 में जमा कराई गई विकास राशि को 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित ‘अमृत योजना-2.0’ के फंड में जमा कराने के निर्देश दिए हैं।
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जांच के आदेश: टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (T&CP) के सचिव और कलेक्टर को यह जांच करने को कहा गया है कि उस समय जमा राशि का उपयोग क्यों नहीं हुआ और इसमें किसकी लापरवाही रही।
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एसटीपी (STP) बंद मिले: एनजीटी द्वारा गठित संयुक्त समिति के निरीक्षण में ‘द प्रास्पेरा’, ‘पामक्रेस्ट’, ‘प्रियदर्शिनी कॉलोनी’ और ‘पिंक सिटी’ जैसे परिसरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) बंद पाए गए, और बिना उपचारित गंदा पानी खुले प्लॉटों व सड़कों पर फैल रहा था।
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पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की चेतावनी: एनजीटी ने तीन महीने के भीतर सभी कॉलोनियों को मुख्य सीवेज लाइन से जोड़ने या टैंकरों के माध्यम से सेप्टिक टैंक खाली कराकर उचित उपचार करने के निर्देश दिए हैं। समयासीमा में काम न होने पर नगर निगम को पर्यावरण क्षतिपूर्ति भरनी होगी।
क्या है पूरा मामला?
वार्ड-53 के अंतर्गत आने वाली प्रियदर्शिनी कॉलोनी और बहुमंजिला इमारतों से सीवेज का उचित निस्तारण न होने के कारण गंदा पानी खाली प्लॉटों में फैल रहा था, जिससे मच्छरों, दुर्गंध और संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ गया था।
जांच में सामने आया कि उस दौर में परियोजना से जुड़े लोगों ने नगर निगम के पास बाहरी विकास शुल्क (98,600 रुपये), बाहरी विकास अनुमति शुल्क (15.56 लाख रुपये) और सुपरविजन शुल्क (1.04 लाख रुपये) के रूप में भारी-भरकम राशि जमा कराई थी, बावजूद इसके सीवेज कनेक्टिविटी का कार्य कागजों तक ही सीमित रहा। एनजीटी के इस कड़े आदेश के बाद अब नगर निगम प्रशासन और संबंधित कॉलोनियों के प्रबंधनों पर सख्त शिकंजा कसना तय माना जा रहा है।




