एग्रसर इंडिया (AgrasarIndia) भोपाल डेस्क टीम
भोपाल के आयकर अधिकारी संतोष निगम की अनूठी पुस्तक: ‘टैक्सेशन जर्नी थ्रू वैदिक पीरियड टू मॉडर्न एरा’ में संकलित है वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक के करों का इतिहास
भोपाल: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में तैनात आयकर अधिकारी संतोष निगम ने भारतीय कर प्रणाली (Taxation System) के इतिहास पर एक बेहद दिलचस्प और शोधपरक पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक का नाम ‘टैक्सेशन जर्नी थ्रू वैदिक पीरियड टू मॉडर्न एरा (राजस्व विरासत)’ है। इसमें प्राचीन वैदिक काल से लेकर आधुनिक स्वतंत्रता उपरांत युग तक कर (Tax) वसूलने की व्यवस्थाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है। पुस्तक की महत्ता को देखते हुए अब इसे आयकर विभाग के सभी कार्यालयों में रखवाने का निर्णय लिया गया है, ताकि कर्मचारी देश की राजस्व विरासत से परिचित हो सकें।
मुख्य बिंदु (Highlights)
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वैदिक और स्मृति काल की कर व्यवस्था: किताब के अनुसार, वैदिक काल में कर को ‘बलि’ और ‘भाग’ के रूप में स्वेच्छा से लिया जाता था, जिसके लिए कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती थी। वहीं स्मृति काल (याज्ञवल्क्य और मनु के समय) में राजा द्वारा प्रजा को सुरक्षा प्रदान करने के बदले उसकी उपज का छठा हिस्सा कर के रूप में लिया जाता था।
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महाभारत काल और भौरे का सिद्धांत: महाभारत काल में कर वसूली को फूल और भौरे के उदाहरण से समझाया गया है। राजधर्मानुशासन के अनुसार, राजा को कर ऐसे वसूलना चाहिए जैसे भौंरा फूलों को बिना नुकसान पहुंचाए रस (शहद) चुकता है, ताकि करदाता पर अनावश्यक आर्थिक बोझ या प्रभाव न पड़े।
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शुक्रनीति और कौटिल्य का अर्थशास्त्र: पुस्तक में ‘शुक्रनीतिसार’ के हवाले से कर जुटाने और उसे विभिन्न जनहित के कार्यों में खर्च करने की व्यवस्था का उल्लेख है। इसके अलावा, कौटिल्य के अर्थशास्त्र का हवाला देते हुए बताया गया है कि जिस तरह पेड़ से समय से पहले कच्चा फल तोड़ना नुकसानदायक है, उसी तरह जनता से समय से पूर्व कर वसूलने से राजा के प्रति विद्रोह की स्थिति बन सकती है।
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मुगल और मराठा कालीन कर: मुगल काल में जकात, जजिया और खराज के रूप में कर लिए जाते थे, जिसमें भूमि की उर्वरता और उत्पादन क्षमता का विशेष ध्यान रखा जाता था। वहीं, मराठा शासनकाल में ‘चौथ’ और ‘सरदेशमुखी’ कर व्यवस्थाओं का प्रमुख रूप से उल्लेख ‘राजस्वव्यवहारकोश’ के आधार पर किया गया है।
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ब्रिटिश काल और आधुनिक आयकर कानून: वर्ष 1860 में जब ब्रिटिश सरकार का घाटा बढ़ा, तब देश में पहली बार आयकर कानून लाया गया। इसके पश्चात, स्वतंत्रता के बाद तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई के प्रयासों से आधुनिक आयकर अधिनियम (IT Act) लाया गया, जिसे 1 अप्रैल 1962 से पूरे देश में लागू किया गया था।




