वाशिंगटन/साइंस डेस्क: गहरे अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले मिशनों के लिए नासा अब तक प्लूटोनियम-238 ($^{238}Pu$) पर निर्भर था, लेकिन अब वैज्ञानिक एक नए रेडियोएक्टिव तत्व Americium-241 ($^{241}Am$) की ओर बढ़ रहे हैं। यह तकनीक न केवल स्पेसक्राफ्ट की उम्र बढ़ाएगी, बल्कि भविष्य के इंटरस्टेलर (Interstellar) मिशनों की राह भी आसान करेगी।
कैसे काम करती है यह ‘न्यूक्लियर बैटरी’?
इस तकनीक को रेडियोआइसोटोप पावर सिस्टम (RPS) कहा जाता है। इसका काम करने का तरीका बेहद सरल लेकिन प्रभावी है:
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गर्मी से बिजली: रेडियोएक्टिव तत्व जब धीरे-धीरे टूटते हैं (Decay), तो उससे गर्मी पैदा होती है।
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कनवर्जन: खास थर्मल डिवाइस इस गर्मी को सीधे बिजली में बदल देते हैं।
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नो मेंटेनेंस: इसमें न तो चार्जिंग की जरूरत होती है और न ही किसी तरह के मेंटेनेंस की। यह माइक्रोग्रैविटी में भी बिना किसी घिसावट के काम कर सकती है।
Americium-241: क्यों है यह प्लूटोनियम से बेहतर?
वैज्ञानिकों का मानना है कि Americium-241 अंतरिक्ष अन्वेषण (Space Exploration) के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा। इसकी तुलना नीचे दी गई टेबल से समझी जा सकती है:
| विशेषता | प्लूटोनियम-238 (238Pu) | Americium-241 (241Am) |
| अर्ध-आयु (Half-life) | ~88 साल | ~433 साल |
| सक्रियता | कम समय के लिए उच्च पावर | लंबे समय तक स्थिर ऊर्जा |
| उपयोग | वर्तमान मिशन (जैसे Voyager) | भविष्य के मल्टी-जनरेशन मिशन |
सबसे बड़ी खूबी: जहां प्लूटोनियम कुछ दशकों में अपनी ताकत खोने लगता है, वहीं Americium-241 चार शताब्दियों से अधिक समय तक सक्रिय रह सकता है। भले ही इसकी शुरुआती बिजली थोड़ी कम हो, लेकिन इसकी ‘लंबी उम्र’ इसे अनमोल बनाती है।
भविष्य के मिशनों पर क्या होगा असर?
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सौर मंडल के पार: अब स्पेसक्राफ्ट को सूरज की रोशनी पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं होगी। यह बैटरी गहरे और अंधेरे अंतरिक्ष में भी स्थिर ऊर्जा देगी।
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शताब्दियों तक चलने वाले मिशन: अब तक के मिशन कुछ दशकों में खत्म हो जाते थे, लेकिन नई तकनीक से मिशन सैकड़ों साल तक सक्रिय रह सकेंगे।
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निरंतर संचार: इससे स्पेसक्राफ्ट के इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन सिस्टम कभी बंद नहीं होंगे, जिससे पृथ्वी तक डेटा पहुंचता रहेगा।
निष्कर्ष
हालांकि यह तकनीक अभी परीक्षण के चरण में है, लेकिन इसके नतीजे बेहद उत्साहजनक हैं। यदि Americium-241 आधारित बैटरियां सफल होती हैं, तो मानवता सौर मंडल की सीमाओं को पार कर ब्रह्मांड के उन रहस्यों को सुलझा सकेगी जो अब तक हमारी पहुंच से बाहर थे।




