भोपाल। बेतवा नदी के उद्गम स्थल पर बने कंक्रीट के ढांचे सहित अन्य निर्माणों को तोड़ना होगा। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की भोपाल बेंच ने इसका आदेश दिया है। संबंधित विभागों को इस तरह के निर्माण के लिए फटकार लगाते हुए अधिकरण ने कहा कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो बेतवा नदी का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है।
पुराणों में वर्णित वेत्रवती यानी बेतवा भोपाल के पास रायसेन जिले के झिरी गांव के जंगल से निकलती है। करीब 610 किमी की दूरी तय कर यह उत्तर प्रदेश में हमीरपुर के पास यमुना में मिल जाती है। यह नदी बुंदेलखंड की जीवनरेखा है।
पिछली गर्मियों में यह नदी उद्गम स्थल पर ही सूख गई थी
पिछली गर्मियों में यह नदी उद्गम स्थल पर ही सूख गई थी। भोपाल के पर्यावरण कार्यकर्ता राहुल शर्मा ने एनजीटी में याचिका दायर कर संरक्षण की मांग की थी। एनजीटी ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और रायसेन कलेक्टर के प्रतिनिधियों से एक संयुक्त समिति गठित करने का निर्देश दिया था।
इस समिति ने पाया कि झिरी गांव स्थित बेतवा के उद्गम स्थल को स्थानीय प्रभावशाली लोगों के हस्तक्षेप से मिट्टी, मलबे और कंक्रीट से ढककर बंद कर दिया गया, जिससे नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हुआ है।
बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की गई
आसपास बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की गई है, जिससे भूजल स्तर गिरा है और मृदा अपरदन बढ़ा है। वहां कटे हुए पेड़ों के ठूंठ भी मिले हैं। समिति ने स्थल निरीक्षण के दौरान उद्गम क्षेत्र में कई अवैध निर्माण भी पाए, जिनमें कंक्रीट का चबुतरा, मंदिर, लोहे की छत वाले ढांचे और झोपड़ियां शामिल हैं।
मामले की अंतिम सुनवाई 28 जनवरी को हुई, तब एनजीटी ने आदेश रिजर्व कर लिया था। अधिकरण ने वन विभाग के प्रमुख सचिव से उद्गम क्षेत्र के संरक्षण के लिए विस्तृत कार्ययोजना मांगी है। इस कार्ययोजना के साथ मामले की अगली सुनवाई 15 अप्रैल को होगी।
एनजीटी ने क्या कहा?
अधिकरण ने कहा कि धार्मिक आस्था के नाम पर प्राकृतिक जलस्रोतों से छेड़छाड़ स्वीकार्य नहीं है। प्रकृति को उसके प्राकृतिक रूप में रहने देना ही उसके संरक्षण का एकमात्र तरीका है। बेतवा के उद्गम को नुकसान पहुंचाना पर्यावरण संरक्षण अधिनियम का गंभीर उल्लंघन है।
अब यह करना होगा?
एनजीटी ने सभी अवैध कंक्रीट संरचनाओं को हटाने के साथ ही नए निर्माण और अतिक्रमण पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया है। नदी को पुनर्जीवित करने के लिए तीन साल की वैज्ञानिक कार्ययोजना को लागू करने, 118 परकोलेशन टैंक, 3000 घन मीटर के चेकडैम और कंटूर ट्रेंच का निर्माण करना होगा। वहीं ‘मियावाकी तकनीक’ से दो हेक्टेयर क्षेत्र में सघन मिश्रित वन लगाने का निर्देश दिया गया है।
वाहनों पर भी रोक लगाने की सिफारिश
समिति ने अपनी अनुशंसा में झिरी क्षेत्र में लोगों को केवल पैदल प्रवेश देने की अनुशंसा की है। कहा गया है कि उद्गम स्थल क्षेत्र में वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जाए और वाहनों को मुख्य रास्ते पर ही रोका जाए। इसके लिए जेड आकार के गेट लगाना उचित होगा। सभी प्राकृतिक जलधाराओं को संरक्षित करने और मानव हस्तक्षेप से दूर रखने की सलाह दी गई है।
बेतवा के प्रदूषण पर भी सख्ती
अधिकरण ने रायसेन, विदिशा और निवाड़ी जिलों के कलेक्टर को नदी की जल गुणवत्ता की नियमित जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। इसमें जिले में प्रवेश और निकासी दोनों स्थलों पर पानी की जांच की जाएगी। साथ ही प्रत्येक जिले में कैचमेंट क्षेत्र सुधार की अलग कार्ययोजना बनाने को कहा है।
क्या कहना है विशेषज्ञों का?
पर्यावरणविद् सुभाष सी. पांडे का कहना है कि कंक्रीट के ढांचों की वजह से ही जल का भूमिगत स्रोत प्रभावित हो रहा है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और क्षेत्र में अवैध निर्माण की वजह से जलस्तर नीचे जा रहा है। पिछली बार गर्मियों में मुख्य जलस्रोत से पानी निकलना ही बंद हो गया था। दो दिन पहले भी नदी के उद्गम स्थल पर जलधारा बेहद कमजोर हो गई थी। इसे संरक्षित नहीं किया गया तो नदी सूख जाएगी।




