मध्य प्रदेश में लंबे समय से अटके ओबीसी आरक्षण विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा हस्तक्षेप किया है। शीर्ष अदालत ने मामले से जुड़ी सभी याचिकाएं वापस मध्य प्रदेश हाईकोर्ट भेज दी हैं। कोर्ट ने एमपी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJ) को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि इन मामलों की सुनवाई के लिए एक विशेष बेंच का गठन किया जाए और वरीयता के आधार पर 3 महीने के भीतर फैसला सुनाया जाए।
छत्तीसगढ़ मॉडल से एमपी को मिल सकती है राहत
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ राज्य के उस अंतरिम आदेश का हवाला दिया, जिसमें 50% की सीमा को पार कर 68% आरक्षण लागू करने की अनुमति दी गई है। कोर्ट ने कहा कि मध्य प्रदेश सरकार चाहे तो उसी ‘छत्तीसगढ़ मॉडल’ की अवधारणा के आधार पर प्रदेश में भी आरक्षण प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकती है। बता दें कि एमपी सरकार ने पूर्व में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था, जो कानूनी पचड़ों में फंसा हुआ है।
दो अन्य बड़े फैसले: कुलगुरु की नियुक्ति और फ्रीज बैंक अकाउंट
1. रानी दुर्गावती विवि के कुलगुरु पर घिरी सरकार
हाईकोर्ट ने रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राजेश कुमार वर्मा की मूल प्राध्यापक पद पर नियुक्ति को लेकर राज्य सरकार को जवाब पेश करने की अंतिम मोहलत दी है। याचिका में आरोप है कि प्रो. वर्मा की नियुक्ति यूजीसी के नियमों के विरुद्ध हुई है और उनके पास अनिवार्य 10 वर्ष का शैक्षणिक अनुभव नहीं था। अगली सुनवाई 23 मार्च को होगी।
2. बैंक अकाउंट फ्रीज करने पर हाईकोर्ट सख्त
जबलपुर के एक व्यापारी रवींद्र कुमार पटेल का बैंक खाता एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक द्वारा फ्रीज किए जाने के मामले में कोर्ट ने राहत दी है। बैंक ने ‘स्कैम की राशि’ आने का हवाला देकर खाता ब्लॉक किया था, जिसे कोर्ट ने तुरंत अनफ्रीज (चालू) करने के निर्देश दिए हैं।
विशेष: क्या बदलेगा अब?
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तेज सुनवाई: अब विशेष बेंच बनने से सालों से पेंडिंग ओबीसी आरक्षण याचिकाओं पर रोजाना या प्राथमिकता से सुनवाई होगी।
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भर्तियों का रास्ता: अगर 27% आरक्षण पर स्थिति स्पष्ट होती है, तो अटकी हुई सरकारी भर्तियों और नियुक्तियों में तेजी आएगी।
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सरकार का रुख: अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह छत्तीसगढ़ के आदेश को आधार बनाकर नई दलीलें पेश करे।




