सिस्टम की 'इमरजेंसी': 20 साल से 'अस्थायी' हैं एमपी के डॉक्टर, सफेद कोट के पीछे छिपी बेबसी
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सिस्टम की ‘इमरजेंसी’: 20 साल से ‘अस्थायी’ हैं एमपी के डॉक्टर, सफेद कोट के पीछे छिपी बेबसी

अग्रसर इंडिया  न्यूज़ डेस्क भोपाल। मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने के लिए सरकारें भले ही नए अस्पतालों और आधुनिक मशीनों का दावा करें, लेकिन प्रदेश के सरकारी डॉक्टरों का एक बड़ा तबका पिछले दो दशकों से ‘प्रशासनिक कोमा’ में है। साल 2004-05 से नियुक्त सैकड़ों डॉक्टर आज भी सरकारी कागजों में ‘प्रोबेशन’ (परिवीक्षा अवधि) पर हैं। सरल शब्दों में कहें तो, जो डॉक्टर हजारों मरीजों की जान बचा रहे हैं, सरकार ने उन्हें 20 साल बाद भी नौकरी में ‘पक्का’ (स्थायी) नहीं किया है।

क्या है प्रोबेशन का पेच? (प्रशासनिक लापरवाही का नमूना)

नियम के मुताबिक, किसी भी सरकारी नौकरी में शुरुआती 2-3 साल ‘प्रोबेशन पीरियड’ होता है। इसे सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद कर्मचारी को स्थायी कर दिया जाता है, जिससे उसके प्रमोशन और वेतन वृद्धि (Increment) के रास्ते खुलते हैं।

विवाद की जड़: मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य विभाग की फाइलों में एक ऐसी धूल जमी है कि 2004 के बाद नियुक्त डॉक्टरों का प्रोबेशन आज तक आधिकारिक रूप से खत्म नहीं हुआ। इसका सीधा अर्थ यह है कि ये डॉक्टर वरिष्ठ होने के बावजूद तकनीकी रूप से अब भी ‘नए और अस्थायी’ कर्मचारी माने जा रहे हैं।


डॉक्टरों की प्रमुख मांगें: सिर्फ पैसा नहीं, सम्मान की भी लड़ाई

मांग समस्या का विवरण
DACP (समयबद्ध पदोन्नति) केंद्र और अन्य राज्यों की तरह समय पर पदोन्नति और वेतनमान मिलना।
पुरानी पेंशन (OPS) 2005 के बाद की नियुक्तियों में भविष्य की सुरक्षा को लेकर चिंता।
प्रशासनिक दखल कम हो अस्पतालों के प्रबंधन में डॉक्टरों की जगह गैर-चिकित्सा अधिकारियों (IAS/SAS) का वर्चस्व।
बॉन्ड की समस्या पीजी के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा की कठोर शर्तें और करोड़ों के बॉन्ड का बोझ।

सरकार बनाम डॉक्टर: आश्वासन की ‘गोली’ से कब तक चलेगा काम?

मध्यप्रदेश में सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, लेकिन डॉक्टरों का यह दर्द ‘क्रोनिक बीमारी’ बन गया है। जब भी चुनाव नजदीक आते हैं, आश्वासन की फाइलें दौड़ती हैं, लेकिन चुनावी शोर थमते ही मामला फिर ठंडे बस्ते में चला जाता है।

वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वास्थ्य सेवाओं में बड़े बदलाव की बात कर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक काम करने वाले डॉक्टरों की ‘सर्विस कंडीशन’ (सेवा शर्तें) नहीं सुधरेंगी, तब तक नई इमारतें खड़ी करने से कोई लाभ नहीं होगा।


जनता पर प्रहार: जब रक्षक ही सड़क पर उतर आएँ

जब एक डॉक्टर को अपने बुनियादी हक के लिए स्ट्राइक करनी पड़ती है, तो उसकी सबसे बड़ी कीमत गरीब मरीज चुकाता है।

  1. ब्रेन ड्रेन (Brain Drain): सिस्टम से तंग आकर अनुभवी विशेषज्ञ डॉक्टर सरकारी नौकरी छोड़कर निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं।

  2. ठप होती सेवाएं: हड़ताल के दौरान जिला अस्पतालों की ओपीडी और इमरजेंसी सेवाएं चरमरा जाती हैं।

  3. युवाओं में निराशा: भारी-भरकम बॉन्ड और करियर में अनिश्चितता को देखकर नए मेडिकल छात्र सरकारी तंत्र से दूर भाग रहे हैं।


निष्कर्ष: समाधान या सिर्फ राजनीति?

स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल ‘सॉफ्टवेयर अपडेट’ या नई मशीनों की जरूरत नहीं है, बल्कि उस ‘मानवीय तंत्र’ को संभालने की जरूरत है जो रात-दिन मरीजों की सेवा करता है। डॉक्टरों की मांग है कि DACP (Dynamic Assured Career Progression) को कैबिनेट की मंजूरी दी जाए और 20 साल पुराने प्रोबेशन के मामले को तत्काल सुलझाया जाए।

यदि सरकार जल्द नहीं जागी, तो मध्यप्रदेश का स्वास्थ्य ढांचा अनुभवहीनता और प्रशासनिक अव्यवस्था के बोझ तले दब जाएगा।

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