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दिल्ली दरबार में ‘कैलाश’ कथा: बयानों की ‘मर्यादा’ और शाह की ‘नसीहत’, जब दिग्गज को तौलनी पड़ी अपनी जुबान

नई दिल्ली/भोपाल: मध्य प्रदेश की सियासत के ‘चाणक्य’ कहे जाने वाले और अपने बेबाक अंदाज के लिए मशहूर कद्दावर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के लिए पिछला हफ्ता कुछ खास ‘सुखद’ नहीं रहा। बजट सत्र में अपनी ही सरकार को रह-रहकर ‘आईना’ दिखाने का जो सिलसिला उन्होंने शुरू किया था, उसकी गूंज आखिरकार दिल्ली के सत्ता गलियारों तक जा पहुंची।

नतीजा यह हुआ कि शनिवार को उन्हें दिल्ली तलब किया गया, जहाँ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उनके साथ बंद कमरे में लंबी गुफ्तगू की। सूत्रों की मानें तो यह मुलाकात महज शिष्टाचार नहीं, बल्कि विजयवर्गीय के हालिया ‘अमर्यादित’ और ‘असहज’ करने वाले बयानों पर लगी एक ‘सॉफ्ट क्लास’ थी।

जब ‘औकात’ पर भारी पड़ा मुख्यमंत्री का ‘खेद’

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष को ‘औकात’ याद दिलाना विजयवर्गीय को खुद भारी पड़ गया। स्थिति इतनी ‘हास्यास्पद’ और गंभीर हो गई कि उनकी इस टिप्पणी के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को सदन में खड़े होकर खुद खेद जताना पड़ा। एक वरिष्ठ मंत्री के शब्दों को सुधारने के लिए मुख्यमंत्री का आगे आना, पार्टी के भीतर अनुशासन और प्रोटोकॉल पर बड़े सवाल खड़े कर गया।

अपनों को ही ‘कटघरे’ में खड़ा करने का शौक?

सत्र के दौरान विजयवर्गीय के बयानों ने विपक्ष से ज्यादा खुद की सरकार को ‘बैकफुट’ पर धकेला:

  • मास्टर प्लान की फाइल: उन्होंने सार्वजनिक रूप से कह दिया कि भोपाल का मास्टर प्लान डेढ़ साल से मुख्यमंत्री के पास लंबित है। यानी, सीधे तौर पर अपनी ही सरकार की कार्यप्रणाली पर उंगली उठा दी।

  • मेट्रो प्रोजेक्ट पर वार: मेट्रो योजना को सिर्फ ‘अधिकारियों का खेल’ बताकर उन्होंने सरकार के एक बड़े विजन को ही विवादों में डाल दिया।

  • भागीरथपुरा कांड: पहले मीडिया से ‘तल्ख’ व्यवहार और फिर सदन में अपनी ही लापरवाही स्वीकार कर उन्होंने सरकार की छवि को ‘दूषित जल’ की तरह ही धुंधला कर दिया।

शाह की ‘नसीहत’: पद बड़ा, तो जुबान पर पहरा भी बड़ा!

दिल्ली में हुई इस मुलाकात में अमित शाह ने विजयवर्गीय को बहुत ही ‘सम्मानजनक’ तरीके से यह याद दिलाया कि संगठन और सरकार की मजबूती के लिए शब्दों का चयन कितना महत्वपूर्ण है।

चुटकी: दिल्ली से संदेश साफ है—”बोलने की आजादी सबको है, लेकिन जब अपने ही घर के शीशे टूटने लगें, तो पत्थर फेंकना बंद कर देना चाहिए।”

माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव और प्रहलाद पटेल से फीडबैक लेने के बाद शाह ने विजयवर्गीय को ‘सोच-समझकर बोलने’ की वह सलाह दी है, जिसे दरकिनार करना किसी भी दिग्गज के लिए आसान नहीं होगा। फिलहाल, भोपाल से दिल्ली तक चर्चा यही है कि क्या अब ‘टाइगर’ की दहाड़ में अनुशासन की चाशनी घुलेगी?

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