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रानी कमलापति से बेगमों ने शासन तक, भोपाल के इतिहास में आज भी बिखरी है महिलाओं की गौरवशाली विरासत

अग्रसर इंडिया: विमेंस डे स्पेशल

भोपाल | झीलों की नगरी भोपाल सिर्फ अपनी खूबसूरती के लिए ही नहीं, बल्कि उस ‘नारी शक्ति’ के लिए भी जानी जाती है जिसने सदियों तक इस रियासत की कमान संभाली। इंटरनेशनल विमेंस डे 2026 के अवसर पर आज हम याद कर रहे हैं उन वीरांगनाओं और शासकों को, जिन्होंने न केवल युद्ध के मैदान में लोहा लिया, बल्कि भोपाल को शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थापत्य कला में आधुनिक बनाया।

1. रानी कमलापति: स्वाभिमान और वीरता की मिसाल

गौंड शासक राजा निजाम शाह की पत्नी रानी कमलापति को भोपाल की अंतिम हिंदू शासक माना जाता है। 18वीं शताब्दी में जब गिन्नौरगढ़ के किले पर विद्रोहियों ने हमला किया, तब रानी ने अदम्य साहस का परिचय दिया। बड़ा तालाब के किनारे बना उनका सात मंजिला महल आज भी उनकी भव्यता की गवाही देता है। उनके सम्मान में ही 2021 में हबीबगंज स्टेशन का नाम बदलकर ‘रानी कमलापति’ रखा गया।

2. मां जी ममोला: भोपाल की ‘अघोषित नवाब’

नवाबी दौर की शुरुआत में मां जी ममोला का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। नवाब दोस्त मोहम्मद खान के बेटे की पत्नी होने के बावजूद, उन्होंने तीन नवाबों के शासनकाल में प्रशासनिक बागडोर संभाली। छोटे तालाब का निर्माण और कई मस्जिदों का मार्गदर्शन उनकी दूरदर्शिता का परिणाम था।

3. बेगमों का 107 साल का सुनहरा दौर (1819-1926)

भोपाल के इतिहास का सबसे अनोखा अध्याय वह था जब लगातार चार महिला शासकों ने 107 वर्षों तक शासन किया:

  • कुदसिया बेगम: पहली महिला शासक जिन्होंने पर्दा प्रथा को त्यागकर तलवार उठाई और आष्टा के युद्ध में जीत हासिल की।

  • सिकंदर बेगम: प्रशासनिक सुधारों और सेना को शक्तिशाली बनाने के लिए प्रसिद्ध।

  • शाहजहां बेगम: कला और वास्तुकला की प्रेमी। उन्होंने ताज-उल-मसाजिद और ताजमहल पैलेस जैसे शानदार निर्माण कराए।

  • सुल्तान जहां बेगम: जिन्हें ‘सरकार अम्मा’ कहा जाता था। वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की पहली महिला चांसलर बनीं और सुल्तानिया जनाना अस्पताल बनवाकर महिलाओं के स्वास्थ्य की नींव रखी।

4. आजादी की लड़ाई में महिलाओं का संघर्ष

भोपाल के भारत में विलय के आंदोलन में भी महिलाओं ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मोहनी देवी, शांति देवी और बसंती देवी जैसी वीरांगनाओं को पुलिस शहर से 50 किमी दूर जंगल में छोड़ देती थी, लेकिन वे पैदल चलकर वापस आती थीं और फिर से आंदोलन में जुट जाती थीं।

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