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नदियों का ‘मायका’ कहलाने वाले MP में गहराया जल संकट, 200 नदियां खत्म होने की कगार पर

 

World Water Day 2026: मध्यप्रदेश में 200 से अधिक छोटी नदियां विलुप्ति के कगार पर हैं। …और पढ़ें

 

Water Day Special: नदियों का 'मायका' कहलाने वाले MP में गहराया जल संकट, 200 नदियां खत्म होने की कगार पर

MP में 200 से ज्यादा नदियां विलुप्ति के कगार पर (AI Generated Image)

HighLights

  1. 158 नालों से रोज 450 मिलियन लीटर गंदा पानी
  2. 40 नदियों के संरक्षण और पुनर्जीवन का काम जारी
  3. कई सहायक नदियां सूखकर नाले में बदल चुकी हैं

भोपाल : मध्य प्रदेश को नदियों का मायका कहा जाता है। इसका कारण यह कि सबसे अधिक नदियां मध्य प्रदेश से ही निकलती हैं। स्थिति यह है कि यहां 200 से अधिक छोटी नदियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। उनकी धार सिमटती जा रही है।

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इनमें से कई तो मध्य प्रदेश की जीवन रेखा कही जाने वाली नर्मदा की सहायक नदियां हैं। इन्हीं में से एक खंडवा की घोड़ा पछाड़ नदी को “रिच टू वैली” (ऊंचाई से घाटी तक) तकनीक से आमजन और शासकीय सहयोग से पुनर्जीवित किया गया है। इसी तरह जबलपुर की गौर, मंदसौर की सिवना और हरदा की अजनाल सहित करीब 40 नदियों के संरक्षण का कार्य किया जा रहा है।

 

नदियों के अस्तित्व पर संकट की चार बड़ी वजह हैं। एक रेत खनन, दूसरा बड़े बांध, तीसरा प्रदूषण और फिर अतिक्रमण। मप्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल की ताजा रिपोर्ट के अनुसार नर्मदा, चंबल, क्षिप्रा, बेतवा, सोन, टोंस, ताप्ती, कान्ह, माही, सिंध, और बेनगंगा सहित प्रमुख नदियों में 158 नालों से प्रतिदिन लगभग 450 मिलियन लीटर घरेलू अपशिष्ट जल मिल रहा है। नदियों के संरक्षण की दृष्टि से पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रह्लाद पटेल खुद 109 नदियों के उद्गम स्थल पर जा चुके हैं।

विंध्य एवं महाकोशल : कहां क्यों दम तोड़ रही नदी की धार

  • डिंडौरी : नर्मदा की सहायक कुतरेल, कसा, सिलगी, खरमेर नदियां अतिक्रमण, रेत खनन और पेड़ों की कटाई के चलते विलुप्त होने की कगार पर हैं।
  • जबलपुर : नर्मदा की सहायक परियट नदी में डेयरियों का गोबर व अन्य अपशिष्ट बहाया जा रहा है, पानी काला पड़ गया है।
  • नरसिंहपुर : यहां जीवन रेखा रही सींगरी नदी गंदगी, अतिक्रमण सहित अन्य कारणों से नाले में तब्दील हो चुकी है।
  • छिंदवाड़ा : पेंच और कन्हान नदी अवैध रेत उत्खनन के कारण दुर्दशा की शिकार हैं।
  • सीधी : जिले के बीचोंबीच स्थित सूखा नदी जीर्णोद्धार न होने से सूख गई।
  • कटनी : जीवनदायिनी कटनी नदी का पानी उपयोग करने लायक नही है।

मैं दूसरी बार 109 नदियों के उद्गम स्थल पर गया। लगभग 50 नदियों के स्रोत ही सूख गए हैं। इससे पहले हम 32 नदियों के उद्गम स्थल पर गए थे, सात में ही पानी मिला था। मेरा लक्ष्य है कि बड़ी नदियों को यदि बारहमासी रखना है तो छोटी को भी बारहमासी रखना होगा। छोटी नदियों पर काम करने की गुंजाइश भी खूब है। पौधारोपण पर जोर दे रहे हैं। प्राकृतिक स्रोत को संरक्षित करना जरूरी है।

– प्रहलाद पटेल, पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री।

संकट में ये नदियां

  • शीरीन नदी : भोपाल के कोहेफिजा से निकली शीरीन कभी भोपाल में मीठे पानी का सबसे बेहतर स्रोत थी, जो अब गंदे नाले में तब्दील हो चुकी है।
  • कलियासोत : शहर के दक्षिणी-पश्चिमी हिस्से की पहाड़ियों से निकलने वाली बेतवा की सहायक कलियासोत नदी अवैध निर्माण, अतिक्रमण और सीवेज मिलने से नाला बन चुकी है।
  • कोलार : रायसेन क्षेत्र की पहाड़ियों से निकलने वाली कोलार नदी और बेतवा की सहायक हलाली नदी अतिक्रमण के चलते संकट में हैं।
  • सीवन नदी : पार्वती की सहायक सीवन के साथ कुलांस और कालीसिंध की सहायक अजनाल नदी अतिक्रमण के चलते संकरी हो गई हैं।
  • पलकमती : नर्मदा की सहायक पलकमती नदी की धार लगातार रेत उत्खनन से सिमटती जा रही है।

 

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