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हमीदिया अस्पताल में कबाड़ बनीं टोकन और डिजिटल डिस्प्ले मशीनें, डिजिटल व्यवस्था ठप होने से मरीजों का बुरा हाल

 

भोपाल शहर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में मरीजों की सहूलियत और कतारों से राहत दिलाने के लिए लाखों रुपये की लागत से लगाई गई आधुनिक टोकन और डिजिटल डिस्प …और पढ़ें

हमीदिया अस्पताल में कबाड़ बनीं टोकन और डिजिटल डिस्प्ले मशीनें, डिजिटल व्यवस्था ठप होने से मरीजों का बुरा हाल

हमीदिया अस्पताल में कबाड़ बनीं टोकन और डिजिटल डिस्प्ले मशीनें

HighLights

  1. डिजिटल व्यवस्था ठप होने से पुराने ढर्रे पर आया अस्पताल
  2. भीषण गर्मी के बीच घंटों कतारों में खड़े रहने को मजबूर हैं मरीज
  3. पूरा सिस्टम ठप होने के कारण अस्पताल में पैर रखने की जगह नहीं

भोपाल। शहर के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा परिसर हमीदिया अस्पताल में इलाज कराने आ रहे मरीजों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। अस्पताल में मरीजों की सहूलियत और कतारों से राहत दिलाने के लिए लाखों रुपये की लागत से लगाई गई आधुनिक टोकन और डिजिटल डिस्प्ले मशीनें पिछले कई दिनों से बंद पड़ी हैं। पूरा सिस्टम ठप होने के कारण अस्पताल में पैर रखने की जगह नहीं मिल रही है और मरीजों के साथ आए उनके परिजन सुबह से लेकर दोपहर तक परेशान हो रहे हैं।

टोकन व्यवस्था बंद होने का सबसे सीधा असर ओपीडी पर्चा काउंटर और दवा वितरण केंद्रों पर देखने को मिल रहा है। चूंकि अब मरीजों को कोई टोकन नंबर नहीं मिल रहा है, इसलिए हर कोई पहले पर्चा बनवाने और दवा लेने की होड़ में लगा है। इसके चलते काउंटरों पर मरीजों की भारी भीड़ उमड़ रही है।

 

कतारों में अव्यवस्था फैलने के कारण मरीजों के बीच आपस में और वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों के साथ आए दिन धक्का-मुक्की और तीखी बहस की स्थिति बन रही है। डिजिटल स्क्रीन बंद होने से मरीजों को यह भी पता नहीं चल पा रहा है कि उनका नंबर कब आएगा या डाक्टर कब बैठेंगे।

चिलचिलाती धूप में बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं बेहाल

इन दिनों शहर में भीषण गर्मी और उमस का प्रकोप है। ऐसे चिलचिलाते मौसम में अस्पताल के भीतर पंखे भी नाकाफी साबित हो रहे हैं। टोकन न मिलने से घंटों लाइनों में खड़े रहने के कारण सबसे ज्यादा फजीहत बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और दूर-दराज से आए गंभीर रूप से बीमार मरीजों को झेलनी पड़ रही है। कतारों में खड़े-खड़े कई मरीजों की तबीयत और ज्यादा बिगड़ रही है, लेकिन प्रबंधन इस ओर ध्यान देने को तैयार नहीं है।

पुराने ढर्रे पर आया अमला, काम हुआ बेहद धीमा

अस्पताल की यह हाईटेक डिजिटल व्यवस्था ठप होने के बाद अब पूरा कामकाज पुराने मैन्युअल (कागजी) तरीके से निपटाया जा रहा है। अस्पताल का स्टाफ हाथ से पर्चियां और रिकॉर्ड दुरुस्त कर रहा है, जिससे काम की रफ्तार बेहद धीमी हो गई है। कंप्यूटर और मशीनों से जो काम चंद सेकंड में हो जाता था, उसमें अब कई मिनट लग रहे हैं।

यही वजह है कि ओपीडी का समय खत्म होने तक काउंटरों पर लाइनें छोटी होने का नाम नहीं ले रही हैं। मरीजों ने अस्पताल प्रशासन से गुहार लगाई है कि इस भीषण तपिश को देखते हुए बंद पड़ी टोकन मशीनों को तत्काल सुधारा जाए, ताकि उन्हें इस रोजाना की प्रताड़ना से मुक्ति मिल सके।

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