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मध्य प्रदेश में ब्लैक स्पॉट्स पर सुधार का असर, घटी सड़क दुर्घटनाएं और मौतों की संख्या

अग्रसर इंडिया खोजी रिपोर्ट | भोपाल

MP में दावों के ‘ब्लैक स्पॉट्स’ पर प्रशासनिक ढिलाई: 3 साल में सिर्फ 35% सुधार, मौतों का आंकड़ा 3900 पार फिर भी कछुआ चाल से जाग रहा PWD!

भोपाल: मध्य प्रदेश की सड़कों पर हर साल हजारों बेकसूर लोग प्रशासनिक लापरवाही और इंजीनियरिंग की कमियों के कारण अपनी जान गंवा देते हैं। अब लोक निर्माण विभाग (PWD) और सरकार अपनी ही पीठ थपथपाने में जुटे हैं कि सूबे में सड़क हादसों और मौतों के आंकड़े थोड़े कम हुए हैं। लेकिन सच्चाई का दूसरा पहलू यह है कि प्रशासन की ‘कछुआ चाल’ के कारण आज भी मध्य प्रदेश की सड़कें खून से लाल हो रही हैं।

विभाग के अपने ही आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि प्रदेश में मौत के कुएं बन चुके 481 ब्लैक स्पॉट्स में से सरकार वर्षों की कागजी कसरत के बाद अब तक महज 35 प्रतिशत स्थानों पर ही सुधार कर पाई है। यानी 65 प्रतिशत से ज्यादा खतरनाक रास्ते आज भी यमराज बनकर मुसाफिरों का इंतजार कर रहे हैं।

परियोजना की बड़ी बातें (HighLights):

  • दावे बनाम हकीकत: जनवरी-मार्च 2026 में हादसों में मामूली कमी का ढिंढोरा, लेकिन 3 महीने में 3,901 मौतें प्रशासनिक विफलता का बड़ा प्रमाण।

  • रेंगती फाइलें: सूबे में कुल 481 ब्लैक स्पॉट्स चिन्हित, सालों बाद भी 65% से ज्यादा खतरनाक मोड़ों पर सुधार का काम पेंडिंग।

  • तारीख पर तारीख: PWD ने अब मार्च 2027 तक का नया डेडलाइन थमाया, तब तक हादसों में जाने वाली जानों की जिम्मेदारी किसकी?

आंकड़ों की बाजीगरी: 3 महीने में 3,901 मौतें क्या विभाग के लिए सिर्फ एक ‘नंबर’ हैं?

प्रशासनिक अमला आंकड़ों को इस तरह पेश कर रहा है जैसे उन्होंने सड़कों को पूरी तरह सुरक्षित कर दिया हो:

  • हादसों का खेल: जनवरी से मार्च 2026 के बीच प्रदेश में 15,278 सड़क दुर्घटनाएं हुईं (पिछले साल यह 16,006 थीं)।

  • मौतों का तांडव: इन तीन महीनों में 3,901 लोगों ने अपनी जान गंवाई (पिछले साल यह आंकड़ा 4,251 था)।

  • घायलों की कतार: 16,550 लोग इन हादसों में गंभीर रूप से घायल या अपाहिज हो गए।

अग्रसर इंडिया का तीखा सवाल: सरकार इस मामूली गिरावट पर राहत की सांस ले सकती है, लेकिन क्या जिम्मेदार अधिकारियों को यह दिखाई नहीं देता कि सिर्फ 90 दिनों के भीतर लगभग 4 हजार परिवारों के चिराग बुझ गए? अगर ब्लैक स्पॉट्स पर सुधार के काम युद्धस्तर पर किए जाते, तो इन 3,901 में से अधिकांश जिंदगियों को बचाया जा सकता था।

सुधार की रफ्तार इतनी धीमी क्यों? 2027 तक का लंबा इंतजार!

चिन्हित किए गए 481 ‘डेथ ट्रैप्स’ (ब्लैक स्पॉट्स) में से जिन 35 फीसदी जगहों पर काम हुआ है, वहां सड़क चौड़ीकरण, संकेतक बोर्ड (साइन बोर्ड), और स्पीड कंट्रोल जैसे बुनियादी काम किए गए हैं। सवाल यह उठता है कि जो काम महीनों में पूरे हो जाने चाहिए थे, उनके लिए सालों का वक्त क्यों लग गया?

अब PWD के बड़े अधिकारी दलील दे रहे हैं कि जटिल और बड़े ब्लैक स्पॉट्स के लिए ‘दीर्घकालिक योजनाएं’ बनाई जा रही हैं और इसके लिए मार्च 2027 तक का लक्ष्य तय किया गया है। साफ है कि कछुआ गति से चलने वाली इस व्यवस्था के कारण जनता को सुरक्षित सड़कों के लिए अभी सालभर और अपनी जान जोखिम में डालनी होगी।

मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठकें सिर्फ कागजों तक सीमित?

हर बार बड़े हादसों के बाद मुख्यमंत्री की तरफ से समीक्षा बैठकें बुलाई जाती हैं, कड़े निर्देश जारी होते हैं और अधिकारियों को ‘नियमित निगरानी’ का पाठ पढ़ाया जाता है। लेकिन धरातल पर PWD और संबंधित विभागों का तालमेल इतना लचर है कि बजट और योजनाएं होने के बावजूद काम फाइलों से बाहर नहीं निकल पाते। जब तक दुर्घटना-प्रवण क्षेत्रों की मॉनिटरिंग और लापरवाही बरतने वाले अफसरों पर सीधे तौर पर ‘क्रिमिनल नेग्लिजेंस’ (आपराधिक लापरवाही) का मुकदमा दर्ज नहीं होगा, तब तक सड़कों पर मौत का यह सिलसिला नहीं थमेगा।

(मध्य प्रदेश की प्रशासनिक कमियों और जनहित के मुद्दों पर तीखी और निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए पढ़ते रहिए अग्रसर इंडिया।)

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