एग्रसर इंडिया (AgrasarIndia)
भोपाल / पर्यावरण एवं वन्यजीव डेस्क
कूनो नेशनल पार्क में चीता प्रोजेक्ट पर गंभीर सवाल: क्षमता से दोगुने हो गए हैं चीते; शिकार की कमी और सुरक्षा उपायों में लापरवाही के कारण बढ़ रहा मानव बस्तियों की ओर पलायन
भोपाल: भारत की महत्वाकांक्षी चीता पुनर्स्थापना परियोजना एक बार फिर गंभीर चुनौतियों और विशेषज्ञों की तीखी आलोचनाओं के घेरे में आ गई है। मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान (Kuno National Park) में चीतों को खुले जंगल में छोड़ने से पहले सुरक्षा के पुख्ता उपाय और अपेक्षित आधारभूत तैयार ियां न किए जाने के परिणाम अब सामने आने लगे हैं। जानकारों और वन विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि कूनो में चीतों की संख्या उनकी पारिस्थितिक वहन क्षमता (Carrying Capacity) से काफी अधिक हो गई है, जिसके चलते उन्हें पर्याप्त प्राकृतिक शिकार नहीं मिल पा रहा है और वे भोजन की तलाश में मानव बस्तियों का रुख करने लगे हैं।
प्रमुख बिंदु (Highlights)
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क्षमता से अधिक हैं कूनो में चीते: आधिकारिक वैज्ञानिक आकलन के अनुसार, कूनो राष्ट्रीय उद्यान की भौगोलिक और पर्यावरणीय स्थिति अधिकतम 25 चीतों की संख्या के अनुकूल मानी गई थी। लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि शावकों सहित कूनो में चीतों की कुल संख्या बढ़कर 52 पहुंच चुकी है, जो निर्धारित क्षमता से लगभग दोगुनी है।
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शिकार की भारी कमी और तेंदुओं का वर्चस्व: पार्क में शाकाहारी वन्यजीवों (जैसे चीतल, सांभर, जंगली सूअर) की कमी को पूरा करने के लिए विभिन्न किस्तों में अब तक करीब 1500 चीतल छोड़े भी गए हैं, लेकिन कूनो के जंगलों में पहले से मौजूद बड़ी संख्या में ‘तेंदुओं’ (Leopards) की मौजूदगी के कारण चीतों को आसानी से शिकार नहीं मिल पा रहा है। चीता आमतौर पर तेंदुओं से संघर्ष से बचता है और दूरी बनाकर रहता है, जिससे उसे भोजन के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है।
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सुरक्षा उपायों की अनदेखी और पलायन: विशेषज्ञों का आरोप है कि चीतों को खुले जंगल में पूरी तरह से रिलीज करने से पहले घास के मैदानों (Grasslands) का अपेक्षित विकास और प्रभावित गांवों के विस्थापन जैसे सुरक्षात्मक पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। नतीजतन, चीते कूनो के जंगलों से निकलकर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों और पड़ोसी राज्यों की तरफ पलायन कर रहे हैं तथा इंसानी बस्तियों में घुसकर पालतू मवेशियों का शिकार कर रहे हैं।
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अप्राकृतिक मौतें और निगरानी तंत्र पर सवाल: वन विभाग भले ही यह दावा करता है कि प्रत्येक चीते की निगरानी के लिए पांच वनकर्मी तैनात हैं, लेकिन लगातार सामने आ रही चीतों की अप्राकृतिक मौतों ने इस हाई-टेक और मैदानी निगरानी तंत्र की पोल खोलकर रख दी है।
विशेषज्ञों की राय
मध्य प्रदेश के सेवानिवृत्त वन बल प्रमुख वीएन अम्बाड़े ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान भी बार-बार इस बात पर जोर दिया था कि चीतों के लिए प्राकृतिक रूप से शिकार की उपलब्धता बढ़ाने के ठोस प्रयास होने चाहिए। महज औपचारिकता निभाते हुए कूनो में चीतल या अन्य शाकाहारी वन्यजीव छोड़ देने भर से समस्या हल नहीं होगी, जब तक कि उनकी सुरक्षा और प्राकृतिक आवास का उचित प्रबंधन न किया जाए।




