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अब ऑनलाइन जांची जाएंगी कॉपियां; हर छात्र का तैयार होगा डिजिटल रिकॉर्ड

 

भोपाल। बरकतउल्ला विश्वविद्यालय (बीयू) अब अपने परीक्षा और मूल्यांकन तंत्र को पूरी तरह हाईटेक करने जा रहा है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की तर्ज पर अब बीयू में भी पारंपरिक लाल पेन से कॉपियां जांचने की व्यवस्था को विदा कर ‘ऑनलाइन डिजिटल वैल्यूएशन’ सिस्टम शुरू किया जा रहा है।

करीब साढ़े तीन लाख छात्रों वाले इस विश्वविद्यालय में मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने, रिजल्ट में होने वाली गड़बड़ियों को रोकने और समय पर परिणाम घोषित करने के उद्देश्य से नोडल एजेंसी तय करने की टेंडर प्रक्रिया तेज कर दी गई है।

कैसे काम करेगा नया डिजीटल सिस्टम?

बीयू प्रशासन के अनुसार, इस नई व्यवस्था को बेहद सुरक्षित और आधुनिक तकनीक के साथ धरातल पर उतारा जाएगा:

बिना नुकसान स्कैनिंग: विश्वविद्यालय का दावा है कि कॉपियों की बाइंडिंग या स्पाइन को काटे बिना ही हाई-स्पीड स्कैनर की मदद से पूरी उत्तरपुस्तिका को हूबहू स्कैन किया जाएगा।

यूनिक आईडी और कंप्यूटर स्क्रीन पर जांच: स्कैन होने के बाद सभी आंसरशीट को मुख्य सर्वर पर अपलोड किया जाएगा। गोपनीयता बनाए रखने के लिए हर आंसरशीट को एक ‘यूनिक आईडी’ अलॉट होगी। इसके बाद परीक्षक (इवैल्यूएटर) कंप्यूटर स्क्रीन पर ही कॉपियों का मूल्यांकन और मार्किंग करेंगे।

डिजीटल रिकॉर्ड: इस व्यवस्था से हर छात्र का पूरा शैक्षणिक और मूल्यांकन रिकॉर्ड हमेशा के लिए डिजिटल फॉर्मेट में सुरक्षित रहेगा।

सीबीएसई जैसी गड़बड़ी न दोहराने की बड़ी चुनौती

प्रशासन जहां इसे पारदर्शी और तेज बता रहा है, वहीं बीयू के सामने इस सिस्टम को बिना किसी चूक के रन करने की एक बड़ी व्यावहारिक चुनौती भी है।

सीबीएसई 12वीं का कड़वा अनुभव: सीबीएसई ने इसी साल 12वीं की परीक्षाओं में यह ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम अपनाया था। लेकिन स्कैन की गई कॉपियों की खराब क्वालिटी, धुंधली इमेज और अन्य तकनीकी कमियों के कारण देश भर में भारी हंगामा मचा था और रिजल्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठे थे।

बीयू के सामने टास्क: सीबीएसई के इस कड़वे अनुभव को देखते हुए बीयू के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसा दोषरहित और फुलप्रूफ सिस्टम खड़ा करने की है, जिससे छात्रों का नुकसान न हो और रिजल्ट विवादों से दूर रहे।

नए सत्र से लागू होने की संभावना

विश्वविद्यालय प्रबंधन के अनुसार, यदि टेंडर प्रक्रिया समय पर पूरी हो जाती है और उपयुक्त नोडल एजेंसी को मंजूरी मिल जाती है, तो पूरी संभावना है कि आगामी सत्र 2026-27 से इस व्यवस्था को पूरी तरह अनिवार्य रूप से लागू कर दिया जाएगा। इससे न केवल कॉपियों के हेरफेर पर लगाम लगेगी, बल्कि पुनर्मूल्यांकन (रीवैल्यूएशन) की नौबत भी बेहद कम आएगी।

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