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गैस पीड़ितों के इलाज की पूरी राशि बिना किसी सीमा के जारी करे सरकार: सुप्रीम कोर्ट निगरानी समिति

भोपाल गैस त्रासदी पीड़ितों के मुफ्त इलाज पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति सख्त: ‘इलाज का पूरा खर्च उठाए गैस राहत विभाग, आयुष्मान की सीलिंग से न बांधें’

भोपाल: भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के मुफ्त और संपूर्ण इलाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति ने एक बार फिर बेहद सख्त रुख अपनाया है। समिति ने गैस राहत विभाग को कड़े निर्देश जारी करते हुए कहा है कि पीड़ितों के अस्पताल के इलाज का पूरा और वास्तविक खर्च हर हाल में विभाग को ही उठाना होगा। कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद, आयुष्मान योजना की तकनीकी कमियों और फंड की तय सीमा (सीलिंग) के कारण आज भी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे पीड़ितों को इलाज के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है।

कोर्ट के आदेशों की अनदेखी: आयुष्मान योजना की सीलिंग बनी बाधा

निगरानी समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी.के. अग्रवाल ने प्रदेश के मुख्य सचिव को एक पत्र लिखकर याद दिलाया है कि सुप्रीम कोर्ट और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कई बार अपने फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि सभी गैस पीड़ितों का मुफ्त इलाज सुनिश्चित करना राज्य सरकार की पूर्ण जिम्मेदारी है।

  • वर्तमान संकट: गैस राहत विभाग वर्तमान में आयुष्मान योजना के तहत किडनी ट्रांसप्लांट जैसे बड़े और गंभीर इलाजों के लिए अधिकतम 4 लाख रुपये की राशि ही मंजूर कर रहा है।

  • वास्तविक खर्च: इसके विपरीत, निजी अस्पतालों में इस तरह के जटिल इलाजों का न्यूनतम खर्च 6.5 लाख रुपये या उससे अधिक आता है।

  • समिति का तर्क: निगरानी समिति के सदस्य पूर्णेन्दु शुक्ला ने साफ तौर पर कहा, “गैस पीड़ित एक विशेष और संवेदनशील श्रेणी में आते हैं। उन्हें किसी भी सामान्य योजना की ऊपरी सीमा (सीलिंग) में नहीं बांधा जा सकता। इलाज के लिए आवश्यक पूरी राशि बिना किसी कटौती के दी जानी चाहिए।”

केस स्टडी: मां किडनी देने को तैयार, पर ₹2.5 लाख की कमी से अधर में निलोफर की सांसें

प्रशासनिक कड़ेपन और नियमों की उलझन का एक दर्दनाक चेहरा 42 वर्षीय गैस पीड़ित निलोफर के मामले में सामने आया है। निलोफर लंबे समय से किडनी ट्रांसप्लांट के लिए सरकारी सहायता का इंतजार कर रही हैं।

बड़ा संकट: एक निजी अस्पताल ने निलोफर के इलाज के लिए 6.5 लाख रुपये का एस्टीमेट दिया है, लेकिन विभाग ने नियमों का हवाला देकर केवल 4 लाख रुपये ही मंजूर किए। निलोफर की बुजुर्ग माँ अपनी बेटी की जान बचाने के लिए खुद की एक किडनी देने को तैयार हैं, लेकिन शेष 2.5 लाख रुपये की व्यवस्था न होने के कारण यह ट्रांसप्लांट अधर में लटका हुआ है।

एनजीओ की चेतावनी: मुख्य सचिव के खिलाफ दायर होगी कोर्ट की अवमानना याचिका

‘भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉर्मेशन एंड एक्शन’ की सह-संयोजक रचना ढींगरा ने इस पूरी स्थिति पर गहरी नाराजगी और चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि गैस पीड़ितों को इलाज के लिए पैसों की कमी का सामना कराना सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना है।

उन्होंने मुख्य सचिव को कड़ी चेतावनी दी है कि यदि इस मामले में तुरंत सुधारात्मक कदम उठाते हुए पीड़ितों को पूरा फंड जारी नहीं किया गया, तो वे अदालत में अवमानना याचिका (Contempt Petition) दायर करेंगी। ढींगरा ने समिति को ऐसे तीन और मरीजों की सूची सौंपी है, जिन्हें इलाज के लिए मजबूरन अपनी जेब से या कर्ज लेकर पैसों का इंतजाम करना पड़ा।

गैस राहत विभाग का पक्ष: नियमों में बदलाव की कवायद शुरू

मामले की गंभीरता को देखते हुए जब गैस राहत विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी से बात की गई, तो उन्होंने स्वीकार किया कि वर्तमान में 4 लाख रुपये की सीमा तय है, जो पुराने समय के हिसाब से तय की गई थी और आज के खर्चों के लिहाज से नाकाफी है। हालांकि, उन्होंने आश्वस्त किया है कि हाल ही में सामने आए इन गंभीर मामलों को देखते हुए विभाग अब इस नीति को बदलने और इलाज की वित्तीय सीमा को पूरी तरह हटाने या बढ़ाने पर गंभीरता से काम कर रहा है।

(अग्रसर इंडिया की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट।)

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