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कान्हा की तर्ज पर MP के 8 टाइगर रिजर्व में भी बनेंगे बफर जोन, सुरक्षा के साथ बढ़ेगा टूरिज्म

एग्रसर इंडिया (AgrasarIndia)

भोपाल / पर्यावरण एवं वन डेस्क

मध्य प्रदेश के 8 टाइगर रिजर्व में बफर वनमंडल गठन की प्रक्रिया तेज: कान्हा की तर्ज पर अलग से होगी डीएफओ की पदस्थापना; वन्यजीव प्रबंधन और इको-टूरिज्म को मिलेगा बढ़ावा

भोपाल: मध्य प्रदेश में वन्यजीवों के संरक्षण, सुरक्षा और उनके बेहतर प्रबंधन के लिए एक बार फिर से एक बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया गया है। राज्य के कान्हा टाइगर रिजर्व को छोड़कर अन्य सभी 8 टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में ‘बफर वनमंडल’ (Buffer Forest Division) गठित करने की अटकी हुई प्रक्रिया को दोबारा शुरू कर दिया गया है। इन बफर वनमंडलों के सुचारू संचालन के लिए अलग से भारतीय वन सेवा (IFS) के डीएफओ (DFO) की पदस्थापना की जाएगी।

प्रमुख बिंदु (Highlights)

  • कान्हा की तर्ज पर अन्य 8 टाइगर रिजर्व में गठन: वर्तमान में प्रदेश के केवल कान्हा टाइगर रिजर्व में ही अलग से बफर वनमंडल अस्तित्व में है। अब इसी तर्ज पर प्रदेश के बाकी आठ टाइगर रिजर्व (जैसे बांधवगढ़, पेंच, पन्ना, सतपुड़ा, संजय-डुमरी, उमरिया आदि) में भी बफर जोन के लिए अलग वनमंडल गठित किए जा रहे हैं।

  • वन्यजीव प्रबंधन और सुरक्षा होगी मजबूत: अभी तक अधिकांश टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र के जंगल अलग-अलग क्षेत्रीय सामान्य वनमंडलों के अधीन बिखरे हुए हैं। बफर वनमंडल के गठन से संपूर्ण क्षेत्र सीधे टाइगर रिजर्व के बफर डीएफओ के एकीकृत प्रबंधन के अधीन आ जाएगा, जिससे कोर और बफर क्षेत्रों के बीच सुरक्षा और आपसी समन्वय और अधिक मजबूत होगा।

  • कोर क्षेत्र पर कम होगा इंसानी दबाव: यह बफर जोन संवेदनशील कोर एरिया को बाहरी मानवीय गतिविधियों और रिहायशी दबाव से बचाने के लिए एक सुरक्षात्मक परत (Protective Layer) के रूप में कार्य करेगा।

ग्रासलैंड विकास और इको-टूरिज्म को मिलेगा बढ़ावा

वन विभाग की इस योजना के तहत बफर वनमंडल क्षेत्रों में वन्यजीवों के लिए विशेष रूप से घास के मैदान (Grasslands) विकसित किए जाएंगे और पानी के प्राकृतिक व कृत्रिम स्रोत तैयार किए जाएंगे। इसका मुख्य लाभ यह होगा कि बाघ और अन्य शाकाहारी वन्यजीव भोजन और पानी की तलाश में कोर एरिया से निकलकर बाहर इंसानी बस्तियों या खेतों की तरफ नहीं भटकेंगे।

इसके अलावा, कान्हा टाइगर रिजर्व की तरह ही अन्य टाइगर रिजर्व के बफर जोन में भी अनूठी ‘इको-टूरिज्म सफारी’ को बढ़ावा मिलेगा। उल्लेखनीय है कि मानसून के मौसम में जब मुख्य कोर क्षेत्र पर्यटकों के लिए बंद रहता है, तब बफर जोन की सफारी खुली रहती है, जिससे स्थानीय स्तर पर पर्यटन और रोजगार के नए अवसर भी सृजित होते हैं।

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